उन दिनों हरान के मैदानों से लौटकर याकूब अपने ससुर लाबान के घर में रह रहा था। धूप तेज थी, और हवा में रेत की महीन परत जमी रहती। राहेल का तम्बू लिआ के तम्बू से कुछ ही दूरी पर था, पर दोनों के बीच एक अनकही खाई बन चुकी थी, जो दिनोंदिन गहरी होती जा रही थी।
लिआ तो एक के बाद एक पुत्रों को जन्म दे रही थी—रूबेन, शमौन, लेवी, यहूदा—और हर बच्चे के साथ उसके चेहरे पर एक तरह की संतुष्टि तैर जाती। पर राहेल बंजर रही। वह देखती कि कैसे याकूब लिआ के तम्बू में ज्यादा वक्त बिताने लगा, क्योंकि बच्चे उधर थे। उसका अपना तम्बू सूनापन लिए रहता। एक शाम, जब याकूब चरागाह से लौटा, तो राहेल ने उसे रोक लिया। उसकी आँखें सूजी हुई थीं।
"मेरे लिए बच्चे दो," उसकी आवाज में गुस्सा और बेबसी का मिला-जुला स्वर था, "नहीं तो मैं मर जाऊँगी।"
याकूब को गुस्सा आ गया। "क्या मैं परमेश्वर हूँ?" उसने कहा, हाथ हवा में उठाते हुए, "जिसने तुझे गर्भ दिया नहीं, मैं उसकी जगह कैसे ले सकता हूँ?"
राहेल चुप हो गई। पर उसके मन में एक योजना पकने लगी। उसकी दासी बिल्हा थी, एक शांत-स्वभाव की लड़की, जो मिस्र से आई थी। कुछ दिन बाद, राहेल ने बिल्हा को अपने पास बुलाया। "देख," उसने कहा, "मेरे पास जाओ। तू मेरे गर्भ की जगह लेगी। तेरे द्वारा मेरे घर में बच्चे जन्मेंगे।"
बिल्हा ने सिर झुका लिया। और ऐसा ही हुआ। बिल्हा गर्भवती हुई, और एक पुत्र को जन्म दिया। प्रसव के समय राहेल तम्बू के बाहर खड़ी थी, बेचैन। जब बच्चे के रोने की आवाज आई, तो उसने हवा में मुट्ठी तान कर कहा, "परमेश्वर ने मेरा न्याय किया है! उसने मेरी सुन ली और मुझे एक पुत्र दिया है।" उसने बच्चे का नाम 'दान' रखा। याकूब ने नाम स्वीकार किया, पर उसकी निगाहों में एक उदासी थी, जो केवल राहेल समझ सकती थी।
फिर बिल्हा ने एक और पुत्र को जन्म दिया। इस बार राहेल ने कहा, "मैंने अपनी बहन से बड़ी लड़ाई लड़ी है, और मैं जीत गई हूँ।" उसने उस बच्चे का नाम 'नप्ताली' रखा।
यह सब देखकर लिआ में जलन हुई। उसने सोचा था कि बच्चों के जन्म के बाद उसका रुतबा बढ़ जाएगा, पर याकूब का प्रेम तो राहेल के प्रति ही बना रहा। अब जब राहेल ने दासी के माध्यम से भी पुत्र पा लिए, तो लिआ ने भी अपनी दासी जिल्पा को याकूब के पास भेजा। जिल्पा भी गर्भवती हुई, और एक पुत्र को जन्म दिया। लिआ ने खुशी से कहा, "किस्मत मेरे पास आई है!" उसने बच्चे का नाम 'गाद' रखा। फिर जिल्पा ने एक और पुत्र को जन्म दिया। लिआ बोली, "मैं भाग्यशाली हूँ, क्योंकि स्त्रियाँ मुझे धन्य कहेंगी।" उसने उस बच्चे का नाम 'अशेर' रखा।
एक बार गेहूँ की कटाई का समय था। रूबेन, जो अब किशोर हो चला था, मैदान में घूमता हुआ कुछ दूधेले पौधे ढूँढ लाया। वह उन्हें लेकर अपनी माँ लिआ के पास गया। राहेल ने उन्हें देखा, और एक अजीब लालसा उसके मन में जागी। वह लिआ के तम्बू में गई। "कृपया मुझे वो दूधेले दे दो," उसने कहा।
लिआ ने उसे तिरछी नजर से देखा। "क्या तूने मेरा पति छीन लिया, अब मेरे बेटे के दूधेले भी छीनना चाहती है?" उसका स्वर कड़वा था।
राहेल ने एक पल सोचा, फिर कहा, "ठीक है। आज रात याकूब तेरे पास आएगा, बदले में तू मुझे ये दूधेले दे दे।"
लिआ ने हैरानी से उसे देखा। इतनी साधारण चीज के लिए? उसने हामी भर दी। शाम को, जब याकूब मवेशियों को समेटकर लौटा, तो लिआ बाहर निकलकर मिली। "तू आज रात मेरे पास रहेगा," उसने कहा, "मैंने तेरे साथ रहने का अधिकार दूधेले के बदले खरीद लिया है।"
याकूब ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। और उस रात के बाद लि�ा फिर गर्भवती हुई। उसने पाँचवें पुत्र को जन्म दिया, और कहा, "परमेश्वर ने मुझे मेरा प्रतिफल दिया है, क्योंकि मैंने अपनी दासी अपने पति को दी।" उसने उसका नाम 'इस्साकार' रखा। फिर एक और पुत्र हुआ। लिआ बोली, "परमेश्वर ने मुझे एक अच्छा भेट दिया है। अब मेरा पति मेरे साथ रहेगा, क्योंकि मैंने उसके छः पुत्र जने हैं।" उसने उसका नाम 'जबूलून' रखा। इसके बाद उसने एक बेटी को भी जन्म दिया, और उसका नाम 'दीना' रखा।
अंततः, परमेश्वर ने राहेल की प्रार्थना सुन ली। उसने उसका गर्भ खोला। राहेल गर्भवती हुई, और एक पुत्र को जन्म दिया। प्रसव के समय उसने पुकारकर कहा, "परमेश्वर ने मेरी निन्दा दूर कर दी है!" उसने बच्चे का नाम 'यूसुफ' रखते हुए कहा, "काश कि यहोवा मुझे एक और पुत्र दे।"
इस सबके बीच, याकूब की स्थिति बदलने लगी। उसने लाबान से कहा, "अब मुझे जाने दो, ताकि मैं अपने घर, अपने देश जा सकूँ। मेरे बच्चों के लिए जो काम मैंने तेरे लिए किया है, उसका मुझे प्रतिफल दो।"
लाबान जानता था कि याकूब के कारण उसकी सम्पदा बढ़ी है। उसने पूछा, "तू क्या मजदूरी चाहता है?"
याकूब ने कहा, "तुझे कुछ नहीं देना होगा। बस इतना कर कि मैं आज से तेरे झुंड में से सभी चितकबरे और धब्बेदार बकरियों, और काले भेड़ों को अलग कर लूँ। यही मेरी मजदूरी होगी। भविष्य में झुंड में जो भी चितकबरे या धब्बेदार बच्चे पैदा होंगे, वे मेरे होंगे।"
लाबान ने यह सौदा मान लिया। पर उसने उसी दिन अपने बेटों को सभी चितकबरे और धब्बेदार बकरियों, और काले भेड़ों को अलग करके तीन दिन की दूरी पर ले जाने का आदेश दिया। याकूब के साथ केवल एक रंग के पशु रह गए।
पर याकूब ने हार नहीं मानी। उसने हरी डालियाँ काटकर उन पर सफेद धारियाँ बनाईं, और उन्हें पानी की नांदों के पास, उन स्थानों पर रख दिया जहाँ पशु पानी पीने आते थे। जब कोई मजबूत पशु गर्मी के समय आकर डालियों के सामने गर्भधारण करता, तो उसके बच्चे धब्बेदार या चितकबरे पैदा होते। याकूब ने ऐसे पशुओं को अलग कर लिया। कमजोर पशुओं के सामने वह डालियाँ नहीं रखता था, इसलिए उनके बच्चे एक ही रंग के होते, जो लाबान के होते। इस तरह, याकूब का झुंड बढ़ता गया, और वह धनी हो गया। उसके पास बहुत से दास, दासियाँ, ऊँट और गदहे हो गए।
हवा में बदलाव की सुगंध आने लगी थी। याकूब के तम्बू के पास, शाम को बैठे हुए, वह अपने बच्चों की आवाजें सुनता—रूबेन, यूसुफ और दूसरों के खेलने की आवाज। उसकी निगाह दूर, हरान की ओर उठी। एक दिन वहाँ से जाना होगा। पर अभी नहीं। अभी तो बच्चे बड़े हो रहे थे, और झुंड बढ़ रहा था। राहेल के तम्बू से यूसुफ का रोना सुनाई दिया, और याकूब उठकर अंदर की ओर चल दिया।
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