बाइबल की कहानी

स्वर्गीय सिंहासन का दर्शन

(यह कहानी प्रकाशितवाक्य के चौथे अध्याय से प्रेरित है, और एक मौलिक, विस्तृत कथा के रूप में...

पवित्र बाइबल

(यह कहानी प्रकाशितवाक्य के चौथे अध्याय से प्रेरित है, और एक मौलिक, विस्तृत कथा के रूप में प्रस्तुत की गई है।)

समुद्र के किनारे बैठा वह बूढ़ा यूहन्ना, पत्थरों पर टिका, आँखें बंद किए हुए था। उम्र ने उसके हाथों को काँपना सिखा दिया था, पर आत्मा अब भी उस जवान चिंगारी की तरह थी जो कभी ‘गर्जने वाला’ कहलाता था। हवा में नमक और सड़े हुए शैवाल की गंध थी। तभी, पीछे से आवाज़ आई—एक ऐसी आवाज़ जैसे पीतल के विशाल घड़े एक साथ टकरा रहे हों, पर उसमें कोई कर्कशपन नहीं था। वह आवाज़ गूँजी, “यहाँ ऊपर आ, और मैं तुझे वह दिखाऊँगा जो इसके बाद होना अवश्य है।”

यूहन्ना ने आँखें खोलीं। समुद्र नहीं था अब सामने। वह जिस चट्टान पर बैठा था, वह अब नहीं थी। एक खुला द्वार था, आकाश में बना हुआ, और वह आवाज़ उसी द्वार के भीतर से आ रही थी। उसका मन काँप उठा, वह जानता था यह कोई साधारण दर्शन नहीं है। पहला कदम उठाने में ही उसे लगा जैसे उसका सारा शरीर हवा हो गया है। और फिर, वह द्वार के पार था।

जो दृश्य उसने देखा, उसे शब्दों में बाँध पाना असंभव सा था। वह एक सिंहासन देखा, और उस पर कोई विराजमान था। उसका वर्णन करने के लिए शब्द फीके पड़ जाते। वह मनुष्य जैसा दिखता था, पर उसकी उपस्थिति में कुछ ऐसा था जो सभी मानवीय सीमाओं से परे था। उसके चारों ओर का आभामंडल पुखराज की तरह चमक रहा था, और सिंहासन के चारों ओर एक इंद्रधनुष था, पन्ने की तरह हरा, शुद्ध और गहरा। यह वह इंद्रधनुष नहीं था जो बारिश के बाद दिखता है; यह तो जैसे स्वयं ‘वादा’ का दृश्य रूप था, चट्टान की तरह स्थिर और अनंत काल तक टिका रहने वाला।

सिंहासन के चारों ओर चौबीस और सिंहासन थे, और उन पर चौबीस प्राचीन बैठे हुए थे। उनके सफेद वस्त्र थे, और सिर पर सोने के मुकुट। उनके चेहरे पर अनुग्रह था, पर आँखों में एक गहरी, शांत गंभीरता भी—ऐसी गंभीरता जो सारे इतिहास को जानती हो। यूहन्ना ने सोचा, शायद यही वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के लिए जीवन बिताया, और अब वे उसकी राज-सभा में न्याय करते हैं।

तभी आवाज़ें गूँजीं—बिजली की कड़कड़ाहट और गर्जन की। सिंहासन से निकल रही थीं वे आवाज़ें। और सिंहासन के सामने सात जलते हुए मशालें थीं, जो सात आत्माएँ हैं, पूरी सृष्टि में फैली हुई परमेश्वर की आत्मा की ज्वाला। उनकी लपटें नाच रही थीं, एक दूसरे से गूँथती हुई, बिना धुएँ के, केवल प्रकाश और ऊष्मा बिखेरती हुई।

लेकिन जिस चीज़ ने यूहन्ना की साँसें रोक दीं, वह थी सिंहासन के बीच में और उसके चारों ओर की चार जीवित प्राणियों की उपस्थिति। वे अजीबोगरीब, भयावह और सुंदर एक साथ थे। पहला प्राणी सिंह जैसा था, उसकी अदम्य शक्ति उसकी गर्दन के बालों में झलक रही थी। दूसरा बछड़े के समान, उसकी आँखों में एक विचितर नम्रता और सहनशीलता थी। तीसरे का चेहरा मनुष्य का था, गहरी बुद्धि और करुणा से भरा हुआ। और चौथा उड़ते हुए उकाब के समान था, जिसकी नज़र दूर-दूर तक, समय और स्थान की सीमाओं से परे देख सकती थी।

हर एक के छह-छह पंख थे। पंखों के ऊपर और शरीर के चारों ओर असंख्य आँखें थीं—सामने, पीछे, भीतर, बाहर। कुछ भी उनसे छिपा नहीं था। वे दिन-रात, बिना रुके, बिना थके यही कहते रहते थे: “पवित्र, पवित्र, पवित्र, प्रभु परमेश्वर, सर्वशक्तिमान, जो था, और जो है, और जो आने वाला है।”

उनकी इस निरंतर स्तुति के साथ ही, चौबीस प्राचीन सिंहासन से उतर पड़ते, और उस पर विराजमान के सामने मुंह के बल गिर जाते। वे अपने सोने के मुकुत उतार कर सिंहासन के सामने रख देते, और यह कहते हुए दंडवत प्रणाम करते: “हे हमारे प्रभु और परमेश्वर, तू ही महिमा और आदर और सामर्थ्य के योग्य है; क्योंकि तू ही ने सब वस्तुओं की सृष्टि की, और तेरी ही इच्छा से वे अस्तित्व में आईं और सृजी गईं।”

यह दृश्य चलता रहा—स्तुति, प्रणाम, मुकुतों का त्याग, फिर स्तुति। एक लय थी इसमें, एक ऐसा संगीत जो कानों से नहीं, आत्मा से सुना जाता था। हवा में गूँजती वे आवाज़ें, मशालों की लपटों का नाच, जीवित प्राणियों के पंखों की सरसराहट, और उन असंख्य आँखों का चमकना—यह सब एक साथ मिलकर एक ऐसा अनुभव बना रहा था जिसमें यूहन्ना अपने आप को बिल्कुल खो चुका था।

उसे लगा जैसे वह समय के बाहर खड़ा है। पतमुस का द्वीप, रोम का अत्याचार, अपनी बुढ़ापे की पीड़ा—सब कुछ धुँधला पड़ गया था। केवल यही वर्तमान था—सिंहासन, और वह जो उस पर विराजमान है। उसकी आँखों से आँसू बह निकले, पर वे दुःख के नहीं थे। वे उस अकथनीय पूर्णता के सामने झुक जाने की प्रतिक्रिया थे, जो सारे सृजन का केंद्र और लक्ष्य थी।

वह जानता था कि यह दर्शन कोई निजी अनुभव नहीं है। यह तो वह सत्य है जो हर युग में, हर सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है। स्वर्ग और पृथ्वी गुज़र जाएँगे, पर यह सिंहासन सदा बना रहेगा। और वह आवाज़, जो गर्जन और बिजली के समान थी, शांति से उसके भीतर बोली, “लिख, यूहन्ना। जो कुछ तू देख रहा है, उसे लिख। क्योंकि देख, वह आने वाला है।”

और चारों जीवित प्राणियों ने फिर से, अपनी सभी आँखों से देखते हुए, अपने पंख फड़फड़ाए, और उनका कंठ एक साथ मिलकर गूँज उठा: “पवित्र, पवित्र, पवित्र।” और यूहन्ना ने, जिसके हाथ अब नहीं काँप रहे थे, अपनी आत्मा की आँखों से देखे गए उन शब्दों को मन में उतार लिया, जो अब पतमुस की चट्टानों पर बैठकर कागज़ पर उतरने वाले थे। समुद्र की हवा एक बार फिर उसके चेहरे से टकराई, पर अब उसमें नमक की गंध नहीं, स्वर्गीय सिंहासन की सुगंध थी।