आज सुबह जब मोहन बाइबिल पढ़ रहा था, तो पौलुस का वह पत्र उसके हाथ में था। खिड़की से आती हल्की धूप में अक्षर जैसे तैर रहे थे। "और हे मेरे भाइयों, मैं नहीं चाहता कि तुम इस बात से अनजान रहो कि हमारे सब बाप-दादे बादल के नीचे थे, और सब के सब समुद्र के बीच से होकर गए।" वह पढ़ता गया। कमरे में सन्नाटा था, पर उसके मन में एक पूरा दृश्य उभरने लगा - विशाल, धूल भरी मरुभूमि, और ऊपर उनका मार्गदर्शन करता हुआ एक अग्नि-स्तंभ। वह सोचने लगा, उन सबने वही आध्यात्मिक भोजन खाया, वही आध्यात्मिक पानी पिया... फिर भी?
उसका ध्यान बाहर खेलते हुए अपने बेटे पर गया। वह फुटबॉल से खेल रहा था, और गलती होते ही गुस्से में चिल्ला उठा, "यह गेंद खराब है!" मोहन मुस्कुराया। कितना आसान है दोष दूसरे पर मढ़ देना। पौलुस के शब्द उसे फिर याद आए, "परन्तु उनमें से अधिकतर परमेश्वर को अप्रसन्न करते रहे, इसलिए वे मरुभूमि में नष्ट हो गए।" नष्ट हो गए। इतने बड़े चमत्कार देखने के बाद, इतनी करीब से अनुग्रह का अनुभव करने के बाद भी। उसका दिल एक अजीब-सी गहराई से धड़का। यह सिर्फ प्राचीन इतिहास नहीं था; यह एक दर्पण था।
दोपहर बाद, जब वह दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहा था, तो उसका फोन बजा। दोस्त था, आनंद। "अरे मोहन, आज शाम को वही नई रेस्तराँ में पार्टी है। तू भी आ जा। जमके मौज-मस्ती होगी।" मोहन ने मेनू देखा था। शानदार खाना, महंगी शराब... और निश्चित ही, उन मूर्तियों के सामने बलि चढ़ाए गए उन पकवानों का जिक्र नहीं होगा। पर पौलुस की चेतावनी कानों में गूंजी, "सो हे मेरे प्रियों, मूर्तिपूजा से बचे रहो।" वह ठहर गया। यह सीधी मूर्तिपूजा नहीं थी, न ही कोई स्पष्ट पाप। यह तो बस 'मौज-मस्ती' थी, 'सामाजिकता' थी। फिर भी, उस अदृश्य रेखा का डर... जहाँ भोजन के नाम पर संगति दूषित हो जाती है। उसने माफ़ी माँगते हुए कहा, "नहीं यार, आज नहीं आ पाऊँगा।" आनंद ने उसे पुराने विचारों का बताया। मोहन ने फोन रख दिया। उसे लगा जैसे वह उस मरुभूमि के किनारे खड़ा है, जहाँ लोग मूछें मटकाते हुए बैल की मूर्ति के चारों ओर नाच रहे थे। क्या वह भी उनमें शामिल होगा?
शाम को, जब परिवार साथ बैठा था, तो उसकी पत्नी नीता ने पूछा, "आज कुछ उदास लग रहे हो?" मोहन ने अपनी बाइबिल खोली और 1 कुरिन्थियों 10 का वह अंश सबको सुनाया। उसने बताया कि कैसे सब कुछ मिलने के बाद भी, असंतोष, परीक्षा और गलत इच्छाओं ने उन्हें गिरा दिया। "पौलुस कहते हैं," मोहन ने आगे पढ़ा, "इसलिए जो समझता है कि मैं खड़ा हूं, वह सावधान रहे कि कहीं गिर न जाए।" बेटा, जो अब शांत बैठा था, बोला, "पापा, मतलब हमें हमेशा डरते रहना चाहिए?" मोहन ने उसके सिर पर हाथ फेरा। "नहीं बेटा, डरने की नहीं, जागृत रहने की बात है। देखो, आगे पौलुस लिखते हैं कि जो परीक्षा तुम्हारे सामने आई है, वह सब मनुष्यों की सामान्य है। परमेश्वर विश्वासयोग्य है... वह तुम्हें सहने की शक्ति भी देगा।"
यह वाक्य कमरे में लटक गया, जैसे कोई घंटा बज उठा हो। *वह सहने की शक्ति भी देगा।* मोहन को एहसास हुआ कि पूरा अध्याय डराने के लिए नहीं, बल्कि आश्वस्त करने के लिए था। चेतावनियाँ थीं, हाँ, ताकि हम घमंड से न गिरें। लेकिन अंत में वादा था - हम अकेले नहीं हैं। उस मरुभूमि के यात्री भी अकेले नहीं थे; बादल और अग्नि-स्तंभ तो सदैव उनके साथ था। उनका पतन तब हुआ जब उन्होंने उसकी उपस्थिति को नज़रअंदाज़ कर दिया, अपनी इच्छाओं को प्रमुख बना लिया।
रात को सोने से पहले, मोहन ने फिर से वे पन्ने पलटे। वह 'लाल समुद्र' के चमत्कार के बारे में सोच रहा था, और फिर उस 'बहिर्गमन' के बारे में जो हर रोज़ हमारे जीवन में होता है - पाप और स्वार्थ के समुद्र से निकलने का संघर्ष। सबक स्पष्ट था: चमत्कारों का अनुभव कर लेना, सिद्ध हो जाने के समान नहीं है। अनुग्रह सुरक्षा की गारंटी नहीं है, यह एक आमंत्रण है - जागृत रहने, विनम्र बने रहने और उस स्रोत की ओर लगातार देखते रहने का, जिसने हमें छुड़ाया है।
वह बिस्तर पर लेटा, और आँखें बंद करते हुए, उसे एक नज़ारा दिखाई दिया: कोई यात्री, थका हुआ, उसी प्राचीन मरुभूमि में चल रहा है। पर अब उसकी आँखें बादल के खंभे पर टिकी हैं, न कि रेत में पड़े उन पुराने कंकालों पर। कदम डगमगाता है, पर गिरता नहीं। क्योंकि चेतावनी उसे सतर्क करती है, और वादा उसे संभालता है। और यही, मोहन ने सोचा, आज के दिन की यात्रा का सार है। बस इतना ही काफी है।
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