श्रृंखलाबद्ध प्रचारक का आनंद

उस कमरे में हवा जमी हुई थी, पत्थर की दीवारों से नमक और सड़ांध की बू आ रही थी। पौलुस ने अपनी कलाई...

श्रृंखलाबद्ध प्रचारक का आनंद

उस कमरे में हवा जमी हुई थी, पत्थर की दीवारों से नमक और सड़ांध की बू आ रही थी। पौलुस ने अपनी कलाई हिलाई तो लोहे की जंजीर खनकी। वह जंजीर उस रोमी प्रहरी से बंधी थी जो अभी-अभी पहरा देने आया था, एक जवान लड़का, चेहरे पर थकान और उदासीनता। पौलुस ने एक लम्बी सांस ली। बाहर, रोम का शोर सुनाई दे रहा था – गाड़ियों के पहियों की चरचराहट, बाजार के हल्ले, दूर कहीं एक बच्चे का रोना। पर इस चार-हाथ कोठरी में सन्नाटा अपनी जड़ें जमाए बैठा था।

उसने मेज पर पड़ी तख़्ती और कलम की ओर देखा। एपफ्रुदितुस कल रवाना हुआ था, फिलिप्पी की कलीसिया के उन प्यारे लोगों के लिए उसका पत्र लेकर। पर पत्र तो बस शुरुआत थी। दिल में उमड़ने वाली बातें, वे शब्दों में कैसे समाएँगी? वह जानता था कि फिलिप्पी के विश्वासी उसकी इस कैद के बारे में सुनकर व्याकुल होंगे। कहीं उनका मन न डगमगा जाए। कहीं यह लगे कि परमेश्वर की योजना विफल हो गई है।

उसने कलम उठाई। दरअसल, कलम उठाने से पहले उसने प्रार्थना की। वह ऐसे लिखना चाहता था जैसे वह उनके बीच बैठकर बात कर रहा हो। पहला शब्द लिखा – “पौलुस”। फिर रुक गया। उसका नाम अब कैदी का नाम था। पर उसने आगे लिखा – “मसीह यीशु का दास।” यही तो उसकी असली पहचान थी। बाकी सब – फरीसी, रबी, रोमन नागरिक – सब धुंधला गया था। सिर्फ यही बचा था।

वह लिखने लगा, पर उसका मन फिलिप्पी पहुँच गया। उसे लुदिया का घर याद आया, नदी किनारे की वह प्रार्थना सभा, उन महिलाओं के चेहरे जो पहली बार सुसमाचार सुन रही थीं। उसे उस जेलर की आँखें याद आईं, जो आत्महत्या करने को था, और फिर उस रात उसने और उसके घर वालों ने नया जन्म पाया। ये सब लोग अब उसकी “सहभागिता” में थे – सुसमाचार के एक साझे में। यह शब्द उसे बहुत प्यारा था। यह बंधन जंजीरों से कहीं गहरा था।

जंजीर फिर खनकी। प्रहरी ने अपना पैर हिलाया था। पौलुस ने उसकी ओर देखा। यह युवक, इसकी आँखों में कितनी खालीपन थी। शायद इसने भी सुना होगा कि यह बूढ़ा यहूदी किस बारे में बातें करता रहता है – एक मसीह नाम के व्यक्ति के बारे में, जो मर गया और फिर जी उठा। क्या इसकी जिज्ञासा जगेगी? पौलुस को अचानक एक विचित्र बात समझ में आई। उसकी यह कैद... क्या यह सुसमाचार फैलाने की एक नई रीत नहीं बन गई है? पूरा प्रिटोरियम का पहरा, यहाँ तक कि शाही घराने के लोग भी, वे सब इस श्रृंखलाबद्ध प्रचारक के बारे में जानने लगे थे। उसकी परेशानियाँ, वास्तव में, सुसमाचार की उन्नति ही तो कर रही थीं। यह विडंबना उसे एक मुस्कान दे गई।

पर फिर दूसरे विचार आए। कुछ लोग तो उसकी इस कैद में ईर्ष्या से प्रचार कर रहे थे। वे सोचते होंगे कि पौलुस के हटने से उन्हें प्रसिद्धि मिलेगी। इस बात ने पौलुस के हृदय में एक पीड़ा दबा दी। पर वह पल भर में ही स्थिर हो गया। “क्या फर्क पड़ता है?” उसने कागज़ पर लिखा, “मुख्य बात यह है कि हर प्रकार से, चाहे बहाने से, चाहे सच्चाई से, मसीह का प्रचार होता है। और मैं इसी में आनन्दित होता हूँ।”

आनन्द। यह शब्द उस कोठरी में एक अजीब सी गूँज छोड़ गया। वह आनन्द कैद की परिस्थितियों से ऊपर था, उन लोगों की ईर्ष्या से परे था, यहाँ तक कि मृत्यु के भय से भी मुक्त था। पौलुस ने अपने भीतर झाँका। उसके लिए, जीना मसीह था। और मरना लाभ। यह कोई नारा नहीं था। यह एक गहरी, शांत निश्चयता थी। अगर वह जीवित रहा, तो और फलदायी श्रम करेगा। अगर मर गया, तो सीधे प्रभु के पास पहुँच जाएगा। दोनों ही स्थितियाँ जीत थीं। इस ज्ञान ने उसकी छाती को एक अद्भुत हल्केपन से भर दिया।

पर फिलिप्पी के लोगों के लिए? उनके लिए वह जीवित रहना ही अधिक आवश्यक था। उनके विश्वास की उन्नति के लिए, उनकी खुशी के लिए। इसलिए उसे विश्वास था कि वह उनके पास फिर लौटेगा। उसने उन्हें ऐसे जीने की चुनौती दी जिससे वे “मसीह के सुसमाचार के योग्य” चलें। एकता में रहें। डरें नहीं। विरोध का सामना करें – क्योंकि यह विरोध तो स्वयं उन्हें मसीह के दुखों में सहभागी बनाता है।

लिखते-लिखते दिन ढलने लगा। कोठरी की खिड़की से तिरछी सुनहरी धूप आकर उसके हाथों पर पड़ी। उसने लिखा कि वह तिमथियुस को जल्द ही उनके पास भेजेगा। और उम्मीद की कि खुद भी जल्द आ पाएगा।

अंत में, वह उन्हें अपनी हालत के बारे में बताना चाहता था। कैसे सम्राट के दरबार में उसका मुकदमा चल रहा था। पर उसने इस बात पर जोर दिया – “क्योंकि मुझे यह बात पवित्र आत्मा के द्वारा दी गई है।” यह कोई मनगढ़ंत आश्वासन नहीं था। यह वह निश्चय था जो प्रार्थना और अनुभव की गहराई से उपजा था।

पत्र समाप्त हुआ। पौलुस ने कलम रख दी। प्रहरी ने उसे देखा। शायद उस युवक ने इस बूढ़े कैदी के चेहरे पर एक अजीब सी शांति देखी, एक ऐसी आशा जो पत्थर की दीवारों और लोहे की जंजीरों से टकराकर भी नहीं टूटी। पौलुस ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा। “तुम भी थके हुए लग रहे हो, बेटा,” उसने धीरे से कहा। प्रहरी कुछ बोला नहीं, पर उसकी आँखों की कठोरता थोड़ी सी पिघली।

बाहर, रोम का शोर गूँजता रहा। पर उस छोटी सी कोठरी में, एक पत्र के माध्यम से, आनन्द की एक ऐसी धारा बह निकली थी जो सदियों की दूरी और कैद की दीवारों को तोड़कर, आज भी हर उस हृदय तक पहुँचती है जो इसे पढ़ता है। और वह आनन्द, वास्तव में, मसीह ही था।

टिप्पणियाँ

टिप्पणियाँ 0

चर्चा पढ़ें और अपनी आवाज़ जोड़ें।

केवल सदस्यों के लिए

चर्चा में शामिल होने के लिए साइन इन करें

हम टिप्पणियों को वास्तविक खातों से जोड़ते हैं ताकि चर्चा साफ और भरोसेमंद रहे।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें।