वह सुबह ऐसी थी मानो संसार नया-नया जन्मा हो। आकाश के किनारे पर सूरज की पहली किरण ने सोने का रंग घोल दिया था, धीरे-धीरे, जैसे कोई चितेरा रंग फैला रहा हो। पहाड़ों की चोटियाँ, अभी तक नीले छायारंग में डूबी हुई थीं, अचानक गुलाबी हो उठीं, फिर सुनहरी। नीचे घाटी में, एक पतली सी धुंध का आवरण था, जो धूप पड़ते ही ऐसे उड़ने लगा जैसे कोई परदा हट रहा हो।
बूढ़ा यिशाई उसी पहाड़ी पर बैठा, अपनी लकड़ी की लाठी को हथेली में टिकाए। उसकी आँखों में, जो अब धुंधली पड़ चुकी थीं, एक अलग ही तेज थी। वह प्रतिदिन यहाँ आता, इस निश्चित समय पर, मानो कोई प्रतीक्षा हो। पर आज, हवा में एक ताजगी थी, एक सनसनी। उसे लगा, जैसे वह सब कुछ पहली बार देख रहा है।
नीचे दूर, नदी चाँदी की तरह चमक रही थी। उसकी धारा के साथ-साथ हरे-हरे वृक्षों की कतार थी, जिनकी शाखाएँ ऐसे फैली थीं जैसे वे आकाश को छूने की कोशिश कर रही हों। यिशाई ने सोचा – यह नदी, यह जल, कहाँ से आता है? उसके स्रोत तो परमात्मा के पास हैं। वही तो बर्फीले पर्वतों को पिघलाता है, झरनों को गिराता है, और फिर यह जल मैदानों में बहता हुआ, हर एक जीव के लिए तृप्ति ले आता है। जंगली गधे अपनी प्यास बुझाते हैं, और पक्षी घासों के बीच से कीड़े चुगते हैं, उनके गले भी यही जल तर करता है।
हवा का एक झोंका आया, और सारे पेड़ एक साथ मर्मराने लगे। यिशाई ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। आकाश, एक विशाल नीला शामियाना, बादलों के हल्के-हल्के टुकड़ों से सजा हुआ था। कुछ बादल भेड़ों के झुंड जैसे लग रहे थे, तो कुछ पहाड़ों के। उसे याद आया कि परमात्मा हवाओं को अपना दूत बनाता है। वही हवाएँ हैं जो बादलों को धकेलकर लाती हैं, दूर-दूर तक, सूखी धरती के ऊपर। और फिर जब वे भारी हो जाते हैं, तो वर्षा की बूंदें गिरने लगती हैं। ऐसी बूंदें जो मिट्टी को मुलायम बनाती हैं, बीजों को फूटने का बल देती हैं, और हरियाली को जन्म देती हैं।
उसकी नज़र दूर खेतों पर गई। वहाँ किसान हल चला रहे थे। भूमि से घास, सब्जियाँ, अन्न – सब कुछ उग आता है। परमात्मा की कृपा से ही तो धरती अन्न से भर जाती है, और मनुष्य का श्रम सफल होता है। उसने देखा, खेत के किनारे एक दाख की बारी थी। उसके फल मदिरा बनेंगे, जो मनुष्य का हृदय प्रफुल्लित करेगी। और जैतून के पेड़... उनका तेल, जो चेहरे पर चमक लाता है। सब कुछ उसी की व्यवस्था में, उसी की योजना में पल रहा है।
तभी, आकाश में एक तेज गति दिखाई दी। एक बाज़, अपने विशाल पंख फैलाए, ऊँची उड़ान भर रहा था। यिशाई मुस्कुराया। परमात्मा ने हर प्राणी को उसके रहने का ठिकाना दिया है। बकरियों के लिए पहाड़ की चट्टानें हैं, और खरगोशों के लिए झाड़ियों के बीच की गुफाएँ। यह बाज़, जो अपना घोंसला दुर्गम चोटियों पर बनाता है, वहाँ से सारे संसार का नज़ारा देखता है। और रात होते ही, जंगल के शिकारी – सियार, शेर – जाग उठते हैं। वे अपनी भूख मिटाने के लिए शिकार करते हैं। सूरज ढलते ही, उनका समय आ जाता है। और फिर सुबह होते ही, वे लौट जाते हैं अपने अड्डों पर, और मनुष्य का काम शुरू हो जाता है। एक लय, एक ताल... सब कुछ नियत समय पर।
समुद्र की ओर देखते हुए, जो क्षितिज पर नीला धुँधला-सा दिखाई देता था, यिशाई ने सोचा उस विशाल जलराशि के बारे में। उसमें तो जहाज़ चलते हैं, और लीव्यातान जैसे विशाल जीव रहते हैं, जिनसे परमात्मा खेलता है। वह सब कुछ बनाता है, बुद्धि से, प्रेम से। उसकी सृष्टि में कहीं कोई कमी नहीं, कोई असंतुलन नहीं।
एकाएक, पास की झाड़ी से चहचहाहट की आवाज़ आई। छोटी-छोटी चिड़ियाएँ, जो अपने घोंसलों में दाना ले जा रही थीं। यिशाई का हृदय भर आया। इतने सारे जीव, छोटे-बड़े, सब उसकी देखरेख में हैं। वही उन्हें भोजन देता है, जब वे मुँह खोलकर चिल्लाते हैं। और जब वह अपना मुँह छिपा लेता है, तो वे व्याकुल हो जाते हैं। जब वह उनकी साँस वापस ले लेता है, तो वे धूल में मिल जाते हैं। पर जब वह फिर से अपनी आत्मा भेजता है, तो सृष्टि नवीन हो उठती है।
सूरज अब ऊँचा चढ़ आया था। पहाड़ी की हवा गर्म होने लगी। यिशाई ने धीरे से आँखें मूँद लीं। उसके होठ हिलने लगे, कोई प्रार्थना नहीं, बस एक आभारी विस्मय की मुद्रा। "हे प्रभु, तुम कितने महान हो। तुमने सब कुछ ज्ञान से ओत-प्रोत कर दिया है। धरती तुम्हारी कृतियों से भरी पड़ी है।"
वह उठा, अपनी लाठी का सहारा लेकर। नीचे उसका गाँव दिखाई दे रहा था, जहाँ से धुएँ के बारीक स्तंभ ऊपर उठ रहे थे। जीवन चल रहा था। उसने एक आखिरी नज़र उस विस्तृत दृश्य पर डाली – आकाश, पहाड़, वन, मैदान। यह सब नश्वर है, पर उसकी महिमा अनंत है। वह जो गाता रहेगा, जब तक उस में प्राण है।
और चलते हुए, उसके कंठ से एक स्वर फूट पड़ा, धीमा, किन्तु दृढ़, जो हवा में मिल गया – "मेरे मन, परमेश्वर की स्तुति कर! हे परमेश्वर, तू अत्यन्त महान है।"
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