परमेश्वर की नींव पर घर

वह दिन अभी तक याद है जिद्दू को। सुबह के चार बजे थे, और ठंडी हवा खिड़की के शीशे पर पानी की...

परमेश्वर की नींव पर घर

वह दिन अभी तक याद है जिद्दू को। सुबह के चार बजे थे, और ठंडी हवा खिड़की के शीशे पर पानी की बूंदें छोड़ रही थी। उसकी आँखें जलती हुईं थीं, और मेज पर बिखरे हुए कागज़ उसकी कोशिशों के गवाह थे। तीन साल से चल रहा था यह सिलसिला – नौकरी की तलाश, एक के बाद एक इंटरव्यू, और हर बार वही जवाब, "हम आपको बताएँगे।" पिता जी का चेहरा, उम्र से पहले ही झुर्रियों से भरा हुआ, उसकी आँखों के सामने तैर गया। वह सोचता, क्या सच में इतनी मेहनत के बाद भी, सब कुछ इसी तरह अनिश्चित रहेगा?

उसी शाम, वह बाबा मदन के पास पहुँचा, जो गाँव के बाहर एक छोटी-सी कुटिया में रहते थे। बाबा बहुत बातें नहीं करते थे, लेकिन उनकी आँखों में एक गहरी शांति थी। जिद्दू ने अपनी सारी थकान, सारी हताशा उँड़ेल दी। बाबा चुपचाप सुनते रहे। फिर, अपनी धीमी, दरकती आवाज़ में बोले, "बेटा, तू एक ऐसे घर की नींव रखने में जुटा है, जिसका नक्शा तुझे याद नहीं। तू ईंट पर ईंट रखे जा रहा है, पर भूल गया है कि जिस ज़मीन पर खड़ा कर रहा है, वह किसकी है।"

बाबा ने एक पुरानी, चमड़े से बँधी बाइबल उठाई, और भजन संहिता का वह अंश पढ़ना शुरू किया, "यदि यहोवा घर न बनाए, तो उसके बनानेवाले व्यर्थ परिश्रम करते हैं..." जिद्दू को लगा, जैसे हर शब्द सीधे उसकी आत्मा में उतर रहा हो। वह आयत आगे बढ़ी, "तुम भोर को जल्द उठना, देर तक बैठे रहना... वह अपने प्रियों को चैन से सुला देता है।"

उस दिन के बाद, कुछ बदल सा गया। जिद्दू ने वही मेहनत जारी रखी, लेकिन उसके भीतर एक ज़िद की जगह एक समर्पण ने ले ली। वह सुबह उठता, अपने हाथ परमेश्वर को समर्पित कर देता, और फिर दिन भर काम में जुट जाता। चिंता ने अपनी जकड़न ढीली कर दी। छह महीने बाद, उसे एक ऐसी नौकरी मिली, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था – एक छोटे से स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का काम। वेतन कम था, लेकिन उसे एक अजीब सी संतुष्टि मिलती थी।

फिर समय बदला। जिद्दू की शादी हुई, मीरा से। एक बच्ची हुई, फिर एक बेटा। जीवन की गाड़ी तेज़ी से दौड़ने लगी। अब उसकी चिंताएँ अलग थीं। बच्चों का भविष्य, उनकी पढ़ाई, एक बड़ा घर बनाने का सपना... वह फिर से उसी दौड़ में शामिल होने लगा। रातें देर तक जागकर प्लान बनाने में कटने लगीं। एक दिन, उसका बेटा, राहुल, जो अब पाँच साल का था, उसके स्टडी रूम में आया। जिद्दू बैंक के कागज़ात में उलझा हुआ था। राहुल ने पूछा, "पापा, तुम मेरे साथ खेलोगे?" जिद्दू ने बिना सिर उठाए कहा, "बाद में, बेटा। अभी पापा बहुत काम में है।"

राहुल चला गया। उसकी वह उदास पीठ देखकर जिद्दू का दिल भर आया। उसे अचानक बाबा मदन की बात याद आ गई, और भजन की वह आयत जो उसने पढ़ी थी, "देख, संतान यहोवा का दिया हुआ भाग हैं..." उसने कागज़ों को एक तरफ रख दिया। उस शाम, वह बच्चों के साथ मैदान में खेला, उनकी हँसी सुनी। मीरा ने जब यह देखा, तो उसकी आँखों में एक चमक थी, जो किसी नए घर के नक्शे से कहीं ज़्यादा कीमती लगती थी।

आज, जिद्दू पचास साल का है। उसका घर बड़ा नहीं है, लेकिन उसमें हँसी भरी है। उसके बच्चे बड़े हो गए हैं। राहुल एक शिक्षक बना है, और उसकी बेटी, प्रिया, एक डॉक्टर। एक बार प्रिया ने उससे पूछा था, "पापा, तुमने कभी बड़ा बिजनेस शुरू करने का सपना नहीं देखा?" जिद्दू ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा था, "बेटी, मैंने एक ऐसा घर बनाने का सपना देखा था, जिसकी नींव परमेश्वर के हाथों में हो। बाकी सब तो उसी की देय है।"

उसने अपनी बाइबल में भजन 127 के आखिरी हिस्से पर नज़र डाली, "जवानी के पुत्र तीरंदाज के हाथ के तीरों के समान हैं। धन्य है वह पुरुष जिसका तरकश उनसे भरा रहता है..." उसे लगा, उसका तरकश खाली नहीं है। उसके पास वह सब है, जिसकी रक्षा उसके निर्माता ने स्वयं की है। और यही सच्चा निर्माण था – न कि पत्थर और सीमेंट का, बल्कि विश्वास और आशीष का। शाम की हल्की लालिमा आँगन में फैल रही थी, और घर में चूल्हे की सुगंध थी। जिद्दू ने आँखें मूंदकर एक शब्द कहा, "धन्यवाद।" यही प्रार्थना पर्याप्त थी।

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