यह बात उस समय की है जब मैं यरूशलेम से दूर, पूरब के उन सूखे इलाकों में भटक रहा था। वह कोई रेगिस्तान नहीं था, बल्कि एक ऐसा स्थान था जहाँ धरती फटी हुई थी, और आकाश तपता हुआ सीसा बन गया था। दिन में तो सूरज की गर्मी हड्डियों तक को पिघला देती, और रातें अचानक ठंडी हो जातीं, जैसे कोई अदृश्य हाथ आग बुझा दे।
एक सुबह, मैंने अपनी मशक उठाई तो वह हल्की लगी। पानी खत्म हो रहा था। मैंने एक पथरीली चट्टान के नीचे छाया ढूँढी और बैठ गया। मेरा गला सूखा हुआ था, जीभ तालू से चिपक सी गई थी। आँखों के सामने धुंधलका छाने लगा। तभी, अचानक, मन में एक पुरानी याद कौंधी—यरूशलेम के भवन, भीड़, और उस पवित्र स्थल की शांति, जहाँ मैंने कभी परमेश्वर के सामने सिर झुकाया था।
वह स्मृति एक ताज़ा झोंके की तरह आई। शरीर तो यहाँ था, इस निर्जन भूमि में, पर मेरी आत्मा कहीं और, किसी और अनुभव में डूब गई। मैंने महसूस किया कि यह प्यास, यह तड़प, केवल पानी के लिए नहीं है। यह कुछ गहरे, कुछ और के लिए है। जैसे इस सूखी भूमि की दरारें बारिश को तरसती हैं, वैसे ही मेरा अस्तित्व उस एक सत्ता के लिए तरसने लगा, जिसकी उपस्थिति मैंने कभी महसूस की थी।
मैंने अपनी आँखें बंद कीं। चारों ओर सन्नाटा था, केवल हवा की सीटी और दूर कहीं एक चील की चीख सुनाई देती। परन्तु इस सन्नाटे में, मैंने एक गूँज सुनी—वह गूँज मेरे भीतर से आ रही थी। "हे परमेश्वर, तू मेरा परमेश्वर है; मैं तुझे तड़प-तड़प कर ढूँढ़ता हूँ।" ये शब्द अपने आप मेरे होंठों पर आ गए, एक प्रार्थना की तरह, जो स्मृतियों से नहीं, बल्कि इस वर्तमान प्यास से पैदा हुई थी।
दिन ढलने लगा। आकाश में नारंगी और बैंगनी रंग फैल गए। मैं चट्टान पर से उतरा और एक छोटी सी पहाड़ी पर चढ़ गया। ऊपर पहुँचकर मैंने हाथ फैलाए। यह प्रार्थना नहीं थी, यह एक स्वीकारोक्ति थी। मैंने कहा, "जैसे शुष्क और बिना पानी के देश में मेरी जीवन-शक्ति तुझ पर लगी रहती है, वैसे ही इस समय भी मेरी आत्मा तेरे लिए ललक रही है।"
रात हो गई। ठंडी हवा चलने लगी। मैंने एक झाड़ी के पास आग जलाई। लपटों की लचकीली जीभें अँधेरे को चीर रही थीं। उस आग की रोशनी में, मैंने अपने जीवन के उन पलों को याद किया, जब मैंने उसकी सामर्थ्य और महिमा को महसूस किया था। वह भय या दबाव से नहीं, बल्कि एक गहरे प्रेम से उपजा आदर था। "तेरी करूणा जीवन से भी बढ़कर है," मैंने फुसफुसाया, "इसलिए मेरे होंठ तेरी स्तुति करेंगे।"
मैं सोया नहीं। पूरी रात, टिमटिमाते तारों के नीचे, मैं बैठा रहा। मेरे मन में वह धुन बजती रही—वही धुन जो दिन में शुरू हुई थी। मैं गुनगुनाता रहा, मेरी आत्मा मेरे भीतर एक वीणा की तरह बज उठी। मेरे हाथ उठे रहे, जैसे कोई भिखारी अपनी खाली थैली फैलाए, पर इसमें याचना नहीं, कृतज्ञता थी।
भोर होने से पहले, जब आकाश किनारे पर हल्का सा फक्का होने लगा, तो एक अद्भुत शांति ने मुझे घेर लिया। वह प्यास, वह तीव्र इच्छा, अब एक तृप्ति में बदल गई थी। यह ऐसा था जैसे मैंने मरुभूमि में रसभरे फल खा लिए हों। मेरी आत्मा मांस से भी अधिक तृप्त और संतुष्ट लग रही थी।
सूरज फिर उगा। पानी तो अब भी कम था, रास्ता लंबा था, पर कुछ बदल गया था। मैंने अपना सामान उठाया। पीछे मुड़कर उस चट्टान को देखा, जहाँ यह सब शुरू हुआ था। मैं मुस्कुराया। क्योंकि मैं जान गया था कि चाहे मैं कहीं भी रहूँ, चाहे कितनी भी सूखी भूमि से गुज़रूँ, मेरी आत्मा की गूँज उससे जुड़ी रहेगी। और जो उसकी छाया में रहते हैं, वे सदा उसकी स्तुति करेंगे, जबकि जो दूसरा रास्ता चुनते हैं, वे इस धरती की गहराइयों में खो जाएँगे।
मैंने अपना सफ़र फिर शुरू किया। अब मेरे कदमों में वह भारीपन नहीं था। हवा में अब भी वही गर्मी थी, पर मेरे भीतर एक ठंडक बह रही थी—एक ऐसा झरना, जो कभी सूखेगा नहीं।
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