लैव्यव्यवस्था 13 पुराना नियम

कोढ़ नहीं, केवल एक दाग

उस सुबह सूरज की पहली किरण ने जंगली जैतून के पेड़ों को सुनहरा रंग दिया था, पर एलियाकीम की नज़र...

लैव्यव्यवस्था 13 - कोढ़ नहीं, केवल एक दाग

उस सुबह सूरज की पहली किरण ने जंगली जैतून के पेड़ों को सुनहरा रंग दिया था, पर एलियाकीम की नज़र अपनी बांह पर थी। एक दाग, बस थोड़ा सा, गुलाबी और बेखबर, त्वचा से थोड़ा उभरा हुआ। उसने उंगली से छुआ। कोई दर्द नहीं। फिर भी उसका दिल एक अजीब सी गांठ में बंध गया। वह बीते सप्ताह से इस पर नज़र रखे हुए था, यह उम्मीद करते हुए कि यह कोई कीड़े का काटा या चोट का निशान होगा जो मिट जाएगा। पर यह नहीं मिटा था। बल्कि, उसकी सूखी त्वचा पर यह और स्पष्ट होता जा रहा था।

उसकी पत्नी, नोमा, ने चुपके से देख लिया था। "यह कुछ नहीं है," उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में वही डर था जो उसकी अपनी आँखों में कौंध गया था। उन दोनों ने शब्द नहीं कहे। उस दाग का नाम नहीं लिया। पर जैसे-जैसे दिन बीते, एलियाकीम ने खुद को अलग-थलग करना शुरू कर दिया। वह भोजन के बर्तन अलग रखने लगा। भोर की प्रार्थना के समय भीड़ से दूर खड़ा होता। बच्चे उसके पास आते तो वह उन्हें हल्के से दूर कर देता, "जाओ, तुम्हारी माँ तुम्हें बुला रही है।"

आखिरकार, वह दिन आया। एलियाकीम ने अपना सिर ढका और धीरे-धीरे उस तंबू की ओर चला, जो शिविर के बाहरी किनारे पर खड़ा था—याजक एलीशाफा का निवास। रेत उसके चप्पलों के नीचे चरचरा रही थी। हवा में भूनते हुए अनाज की महक थी, पर उसे सब कुछ धुंधला सा लग रहा था।

एलीशाफा बाहर बैठा हुआ था, कुछ चमड़े के पत्रों का अध्ययन कर रहा था। उसकी आँखें, अनुभव से भरी हुई, एलियाकीम के चेहरे पर टिक गईं, फिर उसकी बांह पर, जहाँ से कपड़ा हट गया था। कोई औपचारिकता नहीं। बस एक गहरी, थकी हुई सांस।

"दिखाओ," एलीशाफा ने कहा, उसकी आवाज़ में एक स्थिर, निरपेक्ष शांति थी।

एलियाकीम ने अपनी बांह बढ़ा दी। याजक ने ध्यान से देखा। उसने दाग को छुआ, हल्के से दबाया। "कितने दिन हुए?"

"सात। शायद आठ।"

"और बाल? सफेद हुए हैं?"

एलियाकीम ने हाँ में सिर हिलाया। उस दाग के बीचोबीच दो-तीन बाल, दूधिया सफेद, मौसम से सूखे घास की तरह उग आए थे।

एलीशाफा ने अपनी आँखें बंद कर लीं, मानो कुछ याद कर रहा हो। फिर उसने फैसला सुनाया, वह शब्द जो हवा में लटक गया, "तुम्हें सात दिन के लिए अलग रखा जाता है। अपना सामान ले लो, शिविर के बाहर, पूर्व दिशा में, जहाँ और लोग हैं। कोई संपर्क नहीं। 'अशुद्ध, अशुद्ध' कहते रहना जब कोई नज़दीक से गुजरे।"

यह वाक्य सुनने में जितना साधारण लगा, उसका वजन उतना ही भारी था। एलियाकीम ने घर लौटकर देखा—नोमा चूल्हे के पास खड़ी थी, उसकी पीठ उसकी ओर थी। उसके कंधे हल्के से काँप रहे थे। उसने बिना कुछ कहे, एक छोटा सा बंडल बनाया—एक मोटा कंबल, पानी का मशक, कुछ सूखी अंजीर और जौ की रोटी।

अलगाव की जगह एक उजाड़ सी पहाड़ी थी, जहाँ कुछ और आत्माएँ पहले से मौजूद थीं। उनमें से एक बूढ़ा आदमी, जिसका चेहरा धब्बों से ढका था, लगातार फुसफुसा रहा था, "अशुद्ध, अशुद्ध।" दूसरा एक जवान लड़का था, जो अपने हाथों को घूरता रहता था, जैसे वे उसके नहीं थे। कोई बातचीत नहीं होती थी। सिर्फ रेत की हवा का शोर, और कभी-कभी दूर से आती हुई शिविर की आवाजें—बच्चों की हँसी, भेड़ों के मिमियाने की आवाज—जो उनकी दुनिया से बिल्कुल अलग थीं।

एलियाकीम के दिन एक जैसे बीतते थे। वह अपने दाग को देखता, प्रार्थना करता, और उस छोटी सी दुनिया के किनारे बैठा रहता जिससे अब वह बहिष्कृत था। सातवें दिन, एलीशाफा फिर आया। इस बार उसने और गौर से देखा। दाग फीका नहीं पड़ा था। बल्कि, उसकी सीमाएँ थोड़ी और फैल गई लग रही थीं।

"और सात दिन," एलीशाफा ने कहा, और उसकी आँखों में एक ऐसी दया थी जो शब्दों से ज़्यादा बोलती थी।

दूसरे सप्ताह के दौरान, एलियाकीम के मन में विद्रोह के भाव उमड़े। क्यों? वह एक अच्छा आदमी था। उसने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा था। क्या यह उसके पापों की सज़ा थी? पर फिर, शाम की लंबी छायाओं में, उसने सोचना शुरू किया। यह नियम सिर्फ दंड के बारे में नहीं था। यह समुदाय की रक्षा के बारे में था। यह उस चीज़ को अलग करने के बारे में था जो जीवन देने वाले ईश्वर के पवित्र निवास के बीच फैल सकती थी। उसका दुःख स्वार्थपूर्ण नहीं रहा, बल्कि एक गहरी, दर्दनाक समझ में बदलने लगा। वह अशुद्धता का एक जीता-जागता प्रतीक था, और उसका अलगाव दूसरों के लिए एक कृपा थी।

चौदहवें दिन, एलीशाफा तीसरी बार आया। उसने एलियाकीम की बांह पकड़ी, धूप में घुमाई। दाग वही था, न फैला, न सिकुड़ा। पर एलीशाफा ने एक नया निर्देश दिया। "अपने कपड़े धो लो। सिर मुंडवा लो, पर दाढ़ी मत छुओ। फिर सात दिन और अलग रहो। उसके बाद मैं फिर देखूंगा।"

यह आशा की एक किरण थी। शुद्धिकरण का एक क्रम। एलियाकीम ने ऐसा ही किया। उसने अपने गंदे कपड़े झरने के पानी में धोए। एक यात्री नाई, जो उन अशुद्ध लोगों की सेवा के लिए आता था, उसने उसका सिर मुंड दिया। बिना दाढ़ी के उसका चेहरा अजनबी सा लगता था।

आखिरी सात दिन सबसे कठिन थे। आशा ने उसे बेचैन कर दिया था। हर सुबह वह अपनी त्वचा की जांच करता, मानो कोई चमत्कारिक बदलाव हो जाएगा। पर दाग वहीं रहा, एक मूक, गुलाबी गवाह।

इक्कीसवें दिन, जब एलीशाफा आया, तो उसके साथ एक युवा याजक भी था, जो एक लकड़ी का संदूक लिए हुए था। एलीशाफा ने फिर जांच की। लंबी, स्तब्ध खामोशी। फिर वह युवा याजक संदूक लाया। एलीशाफा ने उसमें से दो जीवित, साफ पक्षी निकाले, देवदार की लकड़ी, लाल सूत और जूफा का एक गुच्छा।

"यह त्वचा की एक बीमारी है," एलीशाफा ने अंततः घोषणा की, उसकी आवाज़ में एक निर्णायकता थी। "कोढ़ नहीं। पर पूर्ण शुद्धि के लिए, विधान के अनुसार कर्मकांड करना होगा।"

उन्होंने एक मिट्टी के बरतन में ताजा पानी भरा। एक पक्षी को उसके ऊपर वध कर दिया गया, उसका खून पानी में मिल गया। दूसरे जीवित पक्षी को, देवदार की लकड़ी, लाल सूत और जूफे के साथ, उस खूनमय पानी में डुबोया गया। फिर एलीशाफा ने उस जीवित पक्षी को खुले मैदान में उड़ा दिया। पक्षी आज़ाद होकर आकाश में उड़ता चला गया, जैसे अशुद्धता का प्रतीक दूर जा रहा हो।

एलियाकीम को सात और दिन का इंतज़ार करना था, शिविर के बाहर ही, पर अब उसे 'अशुद्ध' नहीं कहना था। फिर आया वह अंतिम दिन। एलीशाफा ने उसके दाहिने कान के लोव, दाहिने अंगूठे और दाहिने पैन के अंगूठे पर मेल की बलि के खून का लेप लगाया। फिर उसी स्थानों पर जैतून के तेल का। तेल की एक अंतिम अर्घ्य ईश्वर के लिए चढ़ाई गई।

"अब तुम शुद्ध हो," एलीशाफा ने कहा, और पहली बार एक मुस्कुराहट उसके होठों पर खेल गई।

जब एलियाकीम शिविर में लौटा, तो नोमा द्वार पर खड़ी थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस उसके हाथों को पकड़ लिया, और उन्हें अपने गालों से सहलाया। आँसू थे, पर अब दुःख के नहीं, राहत के। बच्चे उससे लिपट गए। पड़ोसियों ने दूर से मुस्कुराकर अभिवादन किया।

उस रात, जब वह अपने तंबू में लेटा हुआ था, तो उसने अपनी बांह को देखा। वह दाग अभी भी वहाँ था, एक मद्धम गुलाबी निशान। पर अब वह उसे डराता नहीं था। वह उसक याद दिलाता था—अलग

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