सिनाई की उस रेगिस्तानी धरती पर हवा भी जैसे थम सी गई थी। दोपहर की तीखी धूप चट्टानों से टकराकर एक तपिश भरी लहर में फैल रही थी। एलीएजर, जो अभी बीस बरस का ही था, अपने पिता के मेमनों के एक छोटे से झुंड को लिए पहाड़ी की तलहटी में बैठा था। पर उसका मन उधर था, जहाँ दूर, धुंधले बादलों से घिरे सिनाई शिखर पर, एक अदृश्य आग धधक रही थी। वह आग जो धुआं नहीं, केवल प्रकाश थी। वह स्थान जहाँ मूसा, उसके लोगों का नेता, परमेश्वर के सामने था।
कई दिन बीत चुके थे। शिविर में एक अजीब सी धीमी बेचैनी थी। नियम मिलने की प्रतीक्षा थी। पुरानी आदतें, मिस्र की गुलामी के दिनों की वह जंगली स्वतंत्रता, अब एक सुव्यवस्थित जीवन के सामने घुटने टेक रही थी। एलीएजर के पिता, एक लेवीवंशी, अक्सर कहते, "बस, अब जीवन का एक ढर्रा बनेगा। ईश्वर की इच्छा स्पष्ट होगी।"
और फिर वह दिन आया। मूसा शिखर से उतरे। उनके हाथ में वह पत्थर की दो तख्तियाँ थीं, जिन पर उँगली से लिखे वे दस वचन थे जो आकाश की गड़गड़ाहट के बीच सबने सुने थे। पर उसके बाद, मूसा ने लोगों को इकट्ठा किया और उन्हें और नियम सुनाए। विस्तार से। जीवन के टूटे-फूटे हिस्सों को जोड़ने वाले नियम।
एलीएजर उस समय वहीं, भीड़ के किनारे खड़ा था। मूसा की आवाज़ गंभीर और स्पष्ट थी, जो चट्टानों से टकराती हुई हर हृदय में गूंज रही थी।
"यदि तू किसी इब्री दास को मोल ले, तो वह छ: वर्ष दासत्व करे; और सातवें वर्ष वह बिना मूल्य दिए स्वतंत्र होकर चला जाए..."
एलीएजर ने अपने चारों ओर देखा। उसकी नजर शिमोन पर पड़ी, जो यित्रो के परिवार का था और अब केलेब के घर में सेवक था। शिमोन के चेहरे पर एक अविश्वसनीय रोशनी दौड़ गई। छह वर्ष? उसने तो सोचा था कि जीवनभर... यह कोई नियम था? यह तो एक वादा था। एक आशा।
मूसा बोलते रहे। चोट के मामले, हाथ के बदले हाथ, आँख के बदले आँख। पर फिर उसमें भी सूक्ष्म भेद। यदि कोई दास की आँख फोड़े, तो उसे स्वतंत्र कर दे। यह न्याय की कठोर लकीर से कहीं आगे की बात थी। यह मनुष्य की गरिमा की बात थी। एक दास, जो संपत्ति समझा जाता था, उसकी देह के टूटने पर भी उसे मुक्ति मिल सकती थी। यह विचार ही नया था।
कुछ दिन बाद, शिविर में एक झगड़ा हुआ। दो पड़ोसी, रूबेन और अशेर, के बीच। रूबेन का बैल भागकर अशेर के खेत में घुस गया था और उसकी नव लगाई बेलों को रौंद डाला था। गरमागरम बहस होने लगी। "तुमने जानबूझकर अपने पशु छोड़े!" "तुमने अपनी बाड़ कमजोर बनाई!"
एलीएजर ने अपने पिता के साथ वहाँ खड़े होकर सुना। पुराने दिनों में यह लड़ाई में बदल सकता था। पर अब मूसा बीच-बचाव करने आए। और उन्होंने निर्गमन की उन्हीं व्यवस्थाओं को सामने रखा।
"जो कोई किसी की खेत की बिना जोती भूमि में, या दाख की बारी में अपना पशु छोड़ दे, और वह दूसरे के खेत में चर जाए, तो उसे अपने खेत के उत्तम फल से, और अपनी दाख की बारी के उत्तम फल से उसका हर्जाना देना होगा।"
आवाज़ें धीमी पड़ गईं। यह निष्पक्ष था। कठोर, पर निष्पक्ष। हर्जाना। क्षतिपूर्ति। बदला नहीं। रूबेन ने अशेर से हाथ मिलाया, और उस वर्ष की फसल में से एक हिस्सा देने का वादा किया। मामला सुलझ गया। एलीएजर हैरान था। शब्दों ने, नियमों ने, हिंसा को रोक दिया था।
पर सबसे गहरा प्रभाव तब पड़ा जब एक और घटना हुई। एक गर्भवती स्त्री, जो दो पुरुषों के झगड़े के बीच आ गई, चोट खा गई और उसका गर्भ गिर गया। शिविर में हाहाकार मच गया। पुराने लोग कहने लगे कि जान के बदले जान ली जाए। पर मूसा ने फिर उन नियमों की ओर इशारा किया। "यदि कोई हानि हो... तो जैसा उस स्त्री का पति मांगे, और न्यायियों के विचार से तुम दो।"
न्यायियों के विचार से। यह पंक्ति एलीएजर के मन में बस गई। यह निरंकुश प्रतिशोध नहीं था। यह सोच-विचार था। परिस्थिति देखना था। जीवन के मूल्य का हिसाब लगाना था। अंत में, दोषी व्यक्ति को एक भारी दंड राशि अदा करनी पड़ी, जिससे उस स्त्री और उसके परिवार का भरण-पोषण हो सके। जान नहीं ली गई। एक और जीवन बच गया, शायद दोनों ही।
एक शाम, जब सूरज सिनाई के पीछे लाल सोने की तरह डूब रहा था, एलीएजर ने अपने पिता से पूछा, "पिताजी, ये सब नियम... ये इतने विस्तार में क्यों? दस वचन तो पर्याप्त थे न?"
उसके पिता ने दूर सिनाई शिखर की ओर देखा, जहाँ अब भी बादल छाया हुआ था। "बेटा," वह बोले, "परमेश्वर केवल विचार नहीं देता। वह राह भी दिखाता है। दस वचन हमारी आत्मा की दिशा बताते हैं, ये नियम हमारे पैरों के निशान। देख, इनमें कोई भी नियम परमेश्वर से प्रेम करने के बारे में नहीं है। ये सब हैं... एक-दूसरे से, और उनसे जो हमसे कमजोर हैं, न्यायपूर्वक प्रेम करने के तरीके। एक दास, एक विदेशी, एक गर्भवती स्त्री, यहाँ तक कि एक हत्यारा भी... हर किसी के लिए एक सीमा, एक अधिकार, एक न्याय। यही तो समाज का निर्माण होता है। यही वह चौखट है, जिसमें रहकर हम वास्तव में स्वतंत्र हो सकते हैं।"
एलीएजर ने अपने मेमनों की ओर देखा। एक मेमना लंगड़ा कर चल रहा था, उसने उसे उठा लिया। नियम... वह सोचने लगा। ये केवल 'नहीं' करने के आदेश नहीं थे। ये 'कैसे' रहने के मार्गदर्शक थे। किसी को चोट पहुँचाने पर उसकी क्षतिपूर्ति कैसे करें। किसी दास को उसकी मानवता कैसे लौटाएँ। यहाँ तक कि एक बैल के द्वारा किए गए नुकसान का हिसाब कैसे लगाएँ।
वह रात को आकाश के नीचे लेटा, तारे टिमटिमा रहे थे। उसे लगा जैसे ये नियम उन तारों की तरह ही हैं। कठोर, दूर, निर्धारित। पर उनकी रोशनी में ही रेगिस्तान के अंधेरे में राह मिल सकती है। यह कोई सिद्धांतों का शुष्क संग्रह नहीं था। यह एक नए प्रकार के लोगों का गठन था। एक ऐसे लोगों का, जिनके लिए न्याय, दया और व्यवस्था एक ही सिक्के के पहलू बन जाएँ।
और तभी उसे समझ आया। ये नियम केवल पत्थर की तख्तियों पर नहीं, अब वे लोगों के हृदय पर लिखे जाने थे। एक पग-पग की यात्रा, जो सिनाई के इस विस्तार से शुरू होकर, जीवन के अनगिनत मोड़ों तक जाएगी। और इस यात्रा का पहला कदम, एलीएजर जानता था, उसने आज ही अपने मन में रख लिया था।
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