यिर्मयाह 20 की कहानी हिंदी में:
यिर्मयाह नबी यहूदा के राज्य में एक ऐसे समय में रहते थे जब लोग परमेश्वर की आज्ञाओं को भूल चुके थे और मूर्तिपूजा तथा अन्याय में डूबे हुए थे। यिर्मयाह को परमेश्वर ने चुना था कि वह लोगों को उनके पापों के बारे में चेतावनी दें और उन्हें सही मार्ग पर लौटने का आह्वान करें। परन्तु, यिर्मयाह का काम आसान नहीं था। उन्हें अक्सर लोगों के विरोध और उपहास का सामना करना पड़ता था।
एक दिन, यिर्मयाह ने यरूशलेम के मंदिर के प्रांगण में खड़े होकर लोगों से बात की। उन्होंने कहा, "हे यहूदा के लोगो, परमेश्वर यहोवा तुमसे कहता है कि यदि तुम अपने बुरे कामों से पश्चाताप नहीं करोगे और उसकी आज्ञाओं का पालन नहीं करोगे, तो वह इस नगर और मंदिर को नष्ट कर देगा। बाबुल के लोग तुम पर आक्रमण करेंगे और तुम्हें बंधक बना लेंगे।"
यिर्मयाह के इन शब्दों को सुनकर लोग क्रोधित हो गए। उनमें से एक व्यक्ति, जिसका नाम पशहूर था, जो मंदिर का प्रधान अधिकारी था, यिर्मयाह के पास आया और उसने उन्हें पकड़ लिया। पशहूर ने यिर्मयाह को मारा और उन्हें मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे हुए लोहे के कड़े में बांध दिया। पशहूर ने यिर्मयाह से कहा, "तू झूठा नबी है! तू लोगों को डरा रहा है। परमेश्वर हमें नहीं छोड़ेगा। हम सुरक्षित हैं।"
यिर्मयाह को पूरी रात उस कड़े में बंधे रहना पड़ा। अगले दिन, जब पशहूर ने उन्हें छोड़ा, तो यिर्मयाह ने उससे कहा, "परमेश्वर यहोवा तुझे पशहूर नहीं, बल्कि 'मगोर-मिस्साबीब' (चारों ओर से भय) कहता है। क्योंकि परमेश्वर यह कहता है कि वह तुझे और तेरे सभी मित्रों को बंधक बना लेगा। तू और तेरे साथी बाबुल में मरोगे और वहीं दफनाए जाओगे।"
यिर्मयाह के ये शब्द सुनकर पशहूर डर गया, परन्तु उसने अपना हृदय कठोर बना लिया और यिर्मयाह की बातों को नज़रअंदाज़ कर दिया।
इस घटना के बाद, यिर्मयाह बहुत दुखी हुए। उन्होंने परमेश्वर से प्रार्थना की और कहा, "हे परमेश्वर, तूने मुझे धोखा दिया है। मैंने तेरे वचन का प्रचार किया, परन्तु लोग मुझे हंसी का पात्र बना रहे हैं। हर दिन मुझे अपमान और उपहास सहना पड़ता है। मैं तेरा नाम लेता हूं, तो लोग मुझे धमकाते हैं। मैं तेरे वचन को अपने हृदय में छुपाना चाहता हूं, परन्तु यह आग के समान है जो मेरे भीतर जल रही है और मैं इसे रोक नहीं सकता।"
यिर्मयाह ने अपनी पीड़ा और निराशा को परमेश्वर के सामने रखा। उन्होंने कहा, "मैंने कभी नहीं सोचा था कि तेरी सेवा करना इतना कठिन होगा। मैं तेरे वचन का प्रचार करने से थक गया हूं। परन्तु, हे परमेश्वर, तू मेरे साथ है। तू ही मेरी शक्ति और सहारा है। मैं जानता हूं कि तू मेरे शत्रुओं से बदला लेगा। तू न्यायी है और तू सत्य है।"
यिर्मयाह ने अपनी प्रार्थना समाप्त की और फिर से परमेश्वर के वचन का प्रचार करने के लिए तैयार हो गए। वे जानते थे कि उनका काम आसान नहीं होगा, परन्तु वे परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए तैयार थे।
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि परमेश्वर के लिए काम करना हमेशा आसान नहीं होता। हमें विरोध और कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, परन्तु हमें विश्वास रखना चाहिए कि परमेश्वर हमारे साथ है और वह हमारी सहायता करेगा। यिर्मयाह की तरह, हमें भी परमेश्वर के वचन का प्रचार करने और उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
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