नीतिवचन 3 पुराना नियम

यरूशलेम का संकट और परमेश्वर की चेतावनी

यशायाह 22 की कहानी एक ऐसे समय की है जब यरूशलेम शहर पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। यह वह समय था जब...

नीतिवचन 3 - यरूशलेम का संकट और परमेश्वर की चेतावनी

यशायाह 22 की कहानी एक ऐसे समय की है जब यरूशलेम शहर पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। यह वह समय था जब परमेश्वर के लोगों ने उनकी आज्ञाओं को नज़रअंदाज़ कर दिया था और अपने ही मार्ग पर चलने लगे थे। यशायाह नबी के माध्यम से परमेश्वर ने यरूशलेम के लोगों को एक गंभीर चेतावनी दी, जो उनके हृदयों को झकझोर देने वाली थी।

यशायाह ने देखा कि यरूशलेम के लोग अपने शहर की सुरक्षा के लिए तैयारियाँ कर रहे थे। वे शहर की दीवारों की मरम्मत कर रहे थे, पानी के भंडारण के लिए कुंओं को गहरा कर रहे थे, और हथियारों का जमावड़ा कर रहे थे। लेकिन उन्होंने परमेश्वर की ओर ध्यान नहीं दिया। वे अपनी ताकत और बुद्धि पर भरोसा कर रहे थे, जबकि उन्हें परमेश्वर की सहायता और मार्गदर्शन की सबसे अधिक आवश्यकता थी।

यशायाह ने लोगों को समझाया कि उनकी सारी तैयारियाँ व्यर्थ होंगी यदि वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं मानेंगे। उसने कहा, "तुमने पानी के कुंओों को गहरा किया है, तुमने शहर की दीवारों को मजबूत किया है, और तुमने हथियारों का भंडार किया है। लेकिन तुमने उस परमेश्वर को भुला दिया है जिसने तुम्हें बनाया है और तुम्हारी रक्षा की है। तुमने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, जो तुम्हारे लिए सब कुछ कर सकता है।"

यशायाह ने लोगों को याद दिलाया कि परमेश्वर ने उन्हें अतीत में कई बार बचाया था। उसने उन्हें दासता से मुक्त किया था, उन्हें शत्रुओं से बचाया था, और उन्हें एक समृद्ध देश दिया था। लेकिन अब वे अपनी सुरक्षा के लिए परमेश्वर पर भरोसा करने के बजाय अपनी योजनाओं और ताकत पर भरोसा कर रहे थे।

यशायाह ने लोगों को चेतावनी दी कि यदि वे अपने मार्गों से नहीं लौटेंगे, तो परमेश्वर का न्याय उन पर आएगा। उसने कहा, "तुम्हारी सारी तैयारियाँ और योजनाएँ व्यर्थ होंगी। तुम्हारे शत्रु तुम पर विजय प्राप्त करेंगे, और तुम्हारा शहर नष्ट हो जाएगा। तुम्हारे पास रोने और शोक मनाने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।"

यशायाह ने लोगों से कहा कि वे अपने पापों से पश्चाताप करें और परमेश्वर की ओर लौटें। उसने उन्हें याद दिलाया कि परमेश्वर दयालु और क्षमाशील है, और यदि वे सच्चे मन से उसकी ओर लौटेंगे, तो वह उन्हें क्षमा करेगा और उनकी रक्षा करेगा।

लेकिन लोगों ने यशायाह की चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर दिया। वे अपनी योजनाओं और तैयारियों में लगे रहे, और परमेश्वर की ओर ध्यान नहीं दिया। परिणामस्वरूप, परमेश्वर का न्याय उन पर आया। उनके शत्रुओं ने उन पर आक्रमण किया, और यरूशलेम शहर नष्ट हो गया। लोगों को अपनी गलतियों का एहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

यशायाह की कहानी हमें यह सिखाती है कि हमें हमेशा परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए और उसकी इच्छा के अनुसार चलना चाहिए। हमारी अपनी ताकत और बुद्धि हमें बचा नहीं सकती, लेकिन परमेश्वर की सहायता और मार्गदर्शन हमें हर संकट से बचा सकता है। हमें अपने पापों से पश्चाताप करना चाहिए और परमेश्वर की ओर लौटना चाहिए, क्योंकि वह दयालु और क्षमाशील है, और वह हमें हमेशा अपनी शरण में लेने के लिए तैयार है।

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