बात उन दिनों की है जब राजा योताम, आहाज और हिजकिय्याह के समय में यहूदा के पहाड़ी इलाकों में साँझ ढलते ही एक अजीब सी सन्नाटा छा जाता था। मोरेशेत के गाँव में रहने वाले बूढ़े एलिय्याह अक्सर अपनी कुटिया के बाहर पत्थर पर बैठकर दूर तक फैले जैतून के बागों को देखा करते। पर आज उनकी आँखें उन बागों से आगे, उत्तर की तरफ थीं, जहाँ से आने वाली हवा में एक अजीब सी गंध थी – जलते हुए घासानों और दूर किसी विध्वंस की मंद गंध।
एलिय्याह ने अपनी लाठी को पकड़कर खड़े होते हुए कहा, “यह हवा... यह सिर्फ हवा नहीं है। यह तो एक सन्देश लेकर आ रही है।”
और सचमुच, उसी शाम, गाँव के किनारे पर एक आदमी आया। उसके चेहरे पर एक अजीब तेज था, मानो उसकी खाल के नीचे कोई आग जल रही हो। वह मीका, मोरेशेत का ही रहने वाला था, पर आज उसकी आँखें वैसी नहीं थीं जैसी एलिय्याह ने बचपन में देखी थीं। उनमें एक गहरा दर्द था, और एक ऐसा भयानक स्पष्टता, जो पहाड़ों पर कड़कती बिजली जैसी थी।
मीका ने गाँव के बीचोंबीच, उस पुराने बबूल के पेड़ के नीचे खड़े होकर अपनी आवाज़ बुलंद की। उसकी आवाज़ में कोई गरज नहीं थी, कोई नाटक नहीं था। बस एक सपाट, थकी हुई, पर अटल सच्चाई थी, जैसे पत्थर पर पड़ी हुई रेखाएँ।
“सुनो,” उसने कहा। “सारे लोग सुनो। यहोवा सिय्योन के महामन्दिर से निकल रहा है। वह अपने पवित्र स्थान से चल पड़ा है। देखो, वह पहाड़ों को रौंदता हुआ आ रहा है, और उसके सामने पहाड़ पिघल रहे हैं, जैसे आग के सामने मोम। घाटियाँ फट रही हैं, जैसे पहाड़ों से पानी बहकर गहरी नालियाँ बना देता है।”
लोग इकट्ठा हुए। कुछ उत्सुकता से, कुछ डर से। एलिय्याह ने अपनी झुर्रियों भरी हथेली से अपना माथा सहलाया। ये बातें... ये बातें सिर्फ शब्द नहीं थीं। वह इन्हें महसूस कर सकता था। जैसे आसमान में बादल छाने से पहले हड्डियों में दर्द होने लगता है, वैसे ही उसकी पुरानी हड्डियाँ एक सिहरन से भर गईं।
“यह सब क्यों?” मीका की आवाज़ में एक करुणा का स्वर टूटा। “यह सब याकूब के अपराध के कारण, इस्राएल के पापों के कारण। याकूब के अपराध का मूल कहाँ है? क्या शोमरोन नहीं? और यहूदा के ऊँचे स्थानों का मूल कहाँ है? क्या यरूशलेम नहीं?”
शोमरोन। उत्तर की राजधानी। एलिय्याह ने व्यापारियों से उसकी बड़ाई सुनी थी। संगमरमर के महल, सोने-चाँदी के बने मूर्ति-स्थल, भव्य उत्सव। पर मीका की ज़ुबान से वह शहर एक भयानक चित्र बनकर उभरा।
“इसलिए,” मीका बोला, और उसकी आँखें अचानक भर आईं, “मैं शोमरोन को एक खेत में पड़ी ईंटों के ढेर के समान कर दूँगा, दाख की बारी लगाने के योग्य। मैं उसकी मूरतों के टुकड़े-टुकड़े करके घाटी में ढकेल दूँगा, उसके सब अश्लील सोने-चाँदी के बुत धूल में मिल जाएँगे। क्योंकि वह व्यभिचार के दाम लेकर इकट्ठे किए गए थे, और अब वे व्यभिचार के दाम ही बनकर किसी और के हाथों में चले जाएँगे।”
एक औरत, जिसका बेटा शोमरोन में व्यापार करने गया था, फूट-फूट कर रोने लगी। उसका रोना हवा में मिल गया, जो अब और भी ठंडी हो चली थी।
फिर मीका ने अपनी बात को और नज़दीक लाया। उसने यहूदा के शहरों के नाम ले-लेकर पुकारा, और हर नाम के साथ एक दुखद भविष्यवाणी जुड़ गई।
“गत में इसका समाचार मत सुनाना,” उसने कहा, मानो अपने ही दिल को समझा रहा हो, “बिल्कड़ रोते न रहना। बेतेअफ्रा में, अपने को धूल में लोट जाओ। शाफीर के निवासी, नंगे होकर और लज्जित होकर निकलोगे। सानान के लोग बच निकलने का साहस भी नहीं कर पाएँगे। बेतेएसेल की विलाप ध्वनि तुम्हारा सहारा छीन लेगी...”
एलिय्याह ने अपनी आँखें बंद कर लीं। ये नाम... ये सिर्फ नाम नहीं थे। ये उसके पड़ोस के गाँव थे, जहाँ उसके रिश्तेदार रहते थे, जहाँ से अनाज और मछली आती थी। हर नाम के साथ, वह एक तस्वीर देखने लगा – भागते हुए लोग, जलते हुए घर, रोती हुई औरतें, और एक गहरी, शर्मिंदा चुप्पी।
मीका की आवाज़ एक लय में डूबने लगी, एक विलाप के गीत जैसी। “लखीश के निवासियों, तेरे पापों ने सिय्योन की बेटी को संक्रमित कर दिया है। इस्रावं के अपराध तुझ में ही पाए जाते हैं। इसलिए तू मोरेशेत-गत को विदाई देगी। अकजीब के घराने धोखा देकर इस्राएल के राजाओं को फँसाएँगे। मारेशा के निवासी, मैं तुम पर एक वारिस ले आऊँगा, और इस्राएल की महिमा अदुल्लाम तक पहुँचेगी।”
यह सुनकर एलिय्याह का सिर घूम गया। मारेशा... वह तो बस पहाड़ी के पार था। और अदुल्लाम... वह गुफाएँ, जहाँ प्राचीन काल में डेविण्ड ने छिपकर शरण ली थी। क्या अब वह फिर से लोगों की शरणस्थली बनेगा? क्या उनकी महिमा, उनका गौरव, इतना टूट जाएगा कि उन्हें जंगली जानवरों और चोरों की गुफाओं में जाना पड़ेगा?
मीका ने अपना संदेश खत्म किया, पर उसकी देह में कोई हल्कापन नहीं था। उसके कंधे झुके हुए थे, जैसे उसने पूरे पहाड़ का बोझ उठा लिया हो। उसने कहा, “अपने बालों को मूंड़ डालो, और अपने प्यारे बच्चों के लिए शोक मनाओ। अपनी गंजाई को गिद्ध के समान कर डालो, क्योंकि वे तुझ से बंधक करके ले जाए जाएँगे।”
लोग चुपचाप खड़े रहे। रोने की आवाज़ें भी अब बंद हो चली थीं। एक भारी, तीखी सच्चाई ने सबको चुप कर दिया था, जैसे तूफान से पहले की नीरवता।
मीका धीरे-धीरे चला गया, उत्तर की तरफ, उसी रास्ते से जिस रास्ते वह आया था। एलिय्याह लम्बी साँस भरकर अपनी कुटिया की तरफ मुड़ा। आसमान में बादल और भी काले हो गए थे। हवा में वही गंध थी – दूर कहीं जलती हुई दुनिया की गंध।
उसने अपने दरवाजे के सामने बैठकर, अपने पोते-पोतियों को, जो अनजाने में खेल रहे थे, देखा। उनकी हँसती हुई आँखों में, उसने आने वाले दिनों की एक झलक देखी – अँधेरा, उजड़न, और फिर... शायद... एक नई शुरुआत का इंतज़ार। क्योंकि भविष्यद्वक्ता की आवाज़ में सिर्फ विनाश ही नहीं था। उस विलाप के गीत के नीचे, एक धुन तो थी ही – वह धुन जो परमेश्वर के दर्द की थी, जो अपने ही लोगों के पाप से आहत होकर, उन्हें शुद्ध करने के लिए आ रहा था।
एलिय्याह ने अपने सिर को हिलाया। कल सुबह, वह अपने बेटे से कहेगा कि वह गढ़वाली बाड़ को और मजबूत करे। पर उससे भी ज़्यादा, वह उसे यह कहेगा कि वह अपने हृदय को, अपने घर को, उन मूरतों से साफ़ करे जो उन्होंने चुपके से अपने जीवन में घर करा ली थीं। क्योंकि न्याय दूर से नहीं, बल्कि ठीक उनके दरवाज़े से शुरू हो रहा था। और यह कहानी, यह चेतावनी, सिर्फ मीका के शब्द नहीं थे – यह उनकी अपनी मिट्टी से उठती हुई एक गूँज थी, जो हवा में तैर रही थी, और अब हर कान में, हर दिल में, अपनी जगह बना चुकी थी।
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