**राजा रहूबियाम और यरूबियाम की कहानी** *(1 राजाओं 12 पर आधारित)*
### **भाग 1: राजा सुलैमान की मृत्यु और रहूबियाम का राज्यभार संभालना** समय बीतता गया, और राजा सुलैमान, जिसने अपने जीवन के अंतिम दिनों में परमेश्वर की आज्ञाओं से मुंह मोड़ लिया था, स्वर्गवासी हो गया। उसका पुत्र रहूबियाम, जो अभी युवा और अनुभवहीन था, शकम नगर में गया, जहां समस्त इस्राएल उसे नया राजा बनाने के लिए एकत्र हुआ था। हवा में उत्साह और आशंका दोनों घुली हुई थी। लोगों के मन में एक सवाल था—क्या यह नया राजा उनके बोझ को हल्का करेगा, या उसके पिता की नीतियों को जारी रखेगा?
### **भाग 2: यरूबियाम और लोगों की याचना** इस्राएल के लोगों ने यरूबियाम को, जो नबात का पुत्र था और सुलैमान के समय में मिस्र भाग गया था, अपना प्रतिनिधि बनाया। वह बुद्धिमान और परिश्रमी था, और लोग उस पर भरोसा करते थे। यरूबियाम ने रहूबियाम के सामने लोगों की पीड़ा रखी:
*"हे राजा! तेरे पिता ने हम पर बहुत भारी जुआ रखा था। अगर तू हमारा बोझ हल्का कर देगा, तो हम तेरी सेवा करेंगे और सदा तेरे अधीन रहेंगे।"*
रहूबियाम ने उन्हें तीन दिन का समय दिया, ताकि वह इस मामले पर विचार कर सके।
### **भाग 3: बुद्धिमान पुरनियों और युवा सलाहकारों की सलाह** राजा ने सबसे पहले उन बुजुर्गों से सलाह मांगी, जिन्होंने सुलैमान के समय में राजकाज देखा था। उन्होंने समझदारी से कहा:
*"यदि तू आज इन लोगों की सेवक बनकर उनकी बात मान ले और उनके प्रति कोमलता दिखाए, तो वे सदा तेरे दास बनकर रहेंगे।"*
किंतु रहूबियाम ने युवा साथियों से भी सलाह ली, जो उसके साथ बड़े हुए थे। उन्होंने उसे कठोरता से काम लेने को कहा:
*"लोगों से कहना—'मेरी छोटी उंगली मेरे पिता की कमर से भी मोटी है! उसने तुम पर भारी जुआ रखा था, पर मैं उसे और बढ़ा दूंगा! मेरे पिता ने तुम्हें कोड़ों से मारा था, पर मैं तुम्हें बिच्छुओं से मारूंगा!'"*
### **भाग 4: रहूबियाम का कठोर उत्तर और इस्राएल का विद्रोह** तीसरे दिन जब लोग फिर एकत्र हुए, तो रहूबियाम ने युवा सलाहकारों की बात दोहराई। उसका उत्तर इतना कठोर था कि लोगों के हृदय में आक्रोश भर गया। वे चिल्लाए:
*"दाऊद के साथ हमारा क्या लेना-देना? यिशै के पुत्र से हमें कोई मतलब नहीं! हे इस्राएल, अपने-अपने घरों को चलो! अब दाऊद का घराना हम पर राज नहीं करेगा!"*
और ऐसा कहकर वे सब अपने-अपने घरों को चले गए। केवल यहूदा के गोत्र ने ही रहूबियाम को राजा के रूप में स्वीकार किया।
### **भाग 5: यरूबियाम का राजा बनना और परमेश्वर की चेतावनी** जब इस्राएल के सभी गोत्रों ने रहूबियाम को ठुकरा दिया, तो उन्होंने यरूबियाम को अपना राजा चुना। रहूबियाम ने सेना इकट्ठी की और विद्रोह को दबाने के लिए तैयार हुआ, किंतु परमेश्वर ने शमायाह नबी के द्वारा कहा:
*"तुम सब अपने-अपने घरों को लौट जाओ, क्योंकि यह सब मेरी ओर से हुआ है।"*
इस प्रकार, इस्राएल का राज्य दो भागों में बंट गया—यहूदा और बिन्यामीन रहूबियाम के साथ रहे, और शेष दस गोत्र यरूबियाम के अधीन हो गए।
### **भाग 6: यरूबियाम का पाप और परमेश्वर का न्याय** यरूबियाम ने डर किया कि यदि लोग यरूशलेम में परमेश्वर के मंदिर जाएंगे, तो वे फिर रहूबियाम के पक्ष में हो जाएंगे। इसलिए उसने दो सोने के बछड़े बनवाए—एक बेतेल में और एक दान में—और लोगों से कहा:
*"यरूशलेम जाने की कोई आवश्यकता नहीं। हे इस्राएल, यही तेरे देवता हैं, जो तुझे मिस्र से निकाल लाए!"*
उसने अन्य पुरोहितों को नियुक्त किया और स्वयं ही वेदी पर बलि चढ़ाने लगा। इस पाप के कारण परमेश्वर ने उसे एक नबी के द्वारा चेतावनी दी, किंतु यरूबियाम ने नहीं सुनी। इस प्रकार, उसका राज्य पाप में डूब गया, और परमेश्वर का न्याय उस पर आने वाला था।
### **निष्कर्ष** इस कहानी से हम सीखते हैं कि अहंकार और कठोरता विनाश का कारण बनती है। रहूबियाम ने बुद्धिमानों की सलाह नहीं मानी, और यरूबियाम ने परमेश्वर के स्थान पर मूर्तियों की पूजा की। दोनों ने परमेश्वर की इच्छा को नकारा, और इसका परिणाम उनके लिए विनाशकारी हुआ। परमेश्वर चाहता है कि हम नम्रता से उसकी आज्ञाओं का पालन करें और दूसरों के प्रति दया दिखाएं।