**पवित्र याजकों की पवित्रता: लैव्यव्यवस्था 21 की कहानी**
एक समय की बात है, जब इस्राएल के लोग सीनै के जंगल में डेरे डाले हुए थे। परमेश्वर ने मूसा को बुलाया और उसे याजकों के लिए विशेष नियम दिए, ताकि वे पवित्र रहकर उसकी सेवा कर सकें। ये नियम हारून और उसके वंश के याजकों के लिए थे, क्योंकि वे परमेश्वर के सामने पवित्र भेंट चढ़ाते थे।
### **याजकों की पवित्रता**
मूसा ने हारून और उसके पुत्रों को इकट्ठा किया और परमेश्वर के वचन सुनाए: *"याजकों को अपने लोगों के बीच पवित्र रहना चाहिए, क्योंकि वे मेरे नाम के लिए समर्पित हैं। वे अपने आप को अशुद्ध न करें, न ही किसी मृतक के कारण अपवित्र हों, सिवाय अपने निकटतम रिश्तेदारों के—माता, पिता, पुत्र, पुत्री, भाई या कुंवारी बहन के लिए।"*
हारून के पुत्रों में से एक, एलीआजर, ने ध्यान से सुना। वह जानता था कि याजक होने का अर्थ है—परमेश्वर के लिए अलग किया जाना। उसने अपने भाइयों से कहा, *"हमें सावधान रहना चाहिए कि कहीं हम अपने कर्तव्य में कोई कमी न छोड़ दें।"*
### **याजकों के विवाह के नियम**
फिर मूसा ने आगे कहा, *"याजकों को पवित्रता बनाए रखनी चाहिए, इसलिए वे किसी वेश्या या अपवित्र स्त्री से विवाह न करें, न ही किसी ऐसी स्त्री से जिसका पति उसे तलाक दे चुका हो। वे केवल कुंवारी इस्राएली स्त्री से ही विवाह कर सकते हैं, या किसी विधवा याजक की पुत्री से।"*
इत्मीनान, हारून के दूसरे पुत्र, इथामार, ने सोचा, *"परमेश्वर हमें शुद्ध रखना चाहता है, क्योंकि हम उसके भेंट चढ़ाते हैं। अगर हम अपने घरों में अशुद्धता लाएँगे, तो हम उसकी सेवा कैसे कर पाएँगे?"*
### **महायाजक की और भी बड़ी पवित्रता**
तब मूसा ने हारून से कहा, *"तू महायाजक है, इसलिए तेरे ऊपर और भी सख्त नियम हैं। तू किसी मृतक के पास न जाए, चाहे वह तेरा माता-पिता ही क्यों न हो। तू अपने सिर के बालों को बिखरा हुआ न छोड़े, न ही अपने वस्त्र फाड़े। तू पवित्र स्थान से बाहर न निकले, नहीं तो तू अपवित्र हो जाएगा, क्योंकि परमेश्वर का अभिषेक तेरे ऊपर है।"*
हारून ने गहरी सांस ली। उसे याद आया कि कैसे उसके दो पुत्र, नादाब और अबीहू, ने परमेश्वर के सामने अनधिकार अग्नि चढ़ाई थी, और उसकी आग ने उन्हें भस्म कर दिया था। वह काँप उठा और बोला, *"मैं परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करूँगा, क्योंकि वह पवित्र है।"*
### **शारीरिक दोष वालों की सेवा**
फिर मूसा ने याजकों के लिए एक और आज्ञा दी: *"कोई भी याजक जिसके शरीर पर कोई दोष हो—चाहे वह अंधा, लँगड़ा, टेढ़ी नाक वाला, टूटा हुआ अंग, या कोई और विकृति हो—वह परमेश्वर के सामने भेंट न चढ़ाए। वह पर्दे के पास न आए, न ही वेदी के निकट, क्योंकि वह मेरे पवित्र स्थान को अशुद्ध न करे। लेकिन वह अपने भाइयों के साथ रह सकता है और पवित्र रोटी खा सकता है।"*
एक युवा याजक, जिसका पैर जन्म से ही टेढ़ा था, ने यह सुना तो उसका हृदय भर आया। उसने मूसा से पूछा, *"क्या मैं कभी परमेश्वर की सेवा नहीं कर पाऊँगा?"* मूसा ने उसे दिलासा देते हुए कहा, *"परमेश्वर ने तुझे अपने लोगों में रखा है। तू उसकी व्यवस्था सिखा सकता है और पवित्र भोजन में भाग ले सकता है। उसकी दृष्टि में तू मूल्यवान है।"*
### **परमेश्वर की पवित्रता का महत्व**
इस प्रकार, मूसा ने याजकों को सिखाया कि परमेश्वर पवित्र है, और जो उसकी सेवा करते हैं, उन्हें भी पवित्र रहना चाहिए। हारून और उसके पुत्रों ने इन नियमों को माना, और इस्राएल के लोगों ने देखा कि परमेश्वर की उपस्थिति में कोई लापरवाही नहीं हो सकती।
और इस तरह, इस्राएल के याजकों ने सीखा कि पवित्रता केवल बाहरी नियम नहीं, बल्कि हृदय की समर्पित भावना है। परमेश्वर चाहता था कि उसके सेवक शुद्ध रहें, ताकि वे उसकी महिमा को प्रकट कर सकें।
**॥ इति समाप्तम् ॥**
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