**यूसुफ और याकूब की मिस्र में बसाहट**
फिरौन के सामने यूसुफ ने अपने पिता याकूब को प्रस्तुत किया। बूढ़े याकूब ने फिरौन को आशीर्वाद दिया। फिरौन ने याकूब से पूछा, "तुम्हारी आयु कितनी है?" याकूब ने उत्तर दिया, "मेरे तीर्थयात्रा के दिन एक सौ तीस वर्ष के हैं। मेरे जीवन के दिन कम और दुःख से भरे रहे हैं, जैसे मेरे पूर्वजों के दिन थे।" इतना कहकर यूसुफ के पिता ने फिरौन को फिर से आशीर्वाद दिया और उसके सामने से चले गए।
यूसुफ ने अपने पिता और भाइयों को मिस्र के सबसे उत्तम प्रदेश, गोशेन नामक भूमि में बसा दिया, जैसे फिरौन ने आज्ञा दी थी। वहाँ उन्होंने अपने परिवारों के लिए घर बनाए और अपने पशुओं के लिए चारागाह ढूँढ़ा। यूसुफ ने उन सभी की देखभाल की और उन्हें अन्न भी प्रदान किया।
इधर, अकाल दिन-प्रतिदिन भयंकर होता जा रहा था। मिस्र और कनान दोनों ही भूख से तड़प रहे थे। लोगों के पास खाने को कुछ नहीं बचा था। यूसुफ ने अन्न के भंडार खोले और मिस्रियों तथा अन्य देशों के लोगों को अनाज बेचा, क्योंकि अकाल बहुत भयानक था।
धीरे-धीरे, मिस्र के लोगों के पास पैसे खत्म हो गए। सब यूसुफ के पास आकर कहने लगे, "हमें खाने को दो! क्या हम पैसों के बिना मर जाएँ?" यूसुफ ने उत्तर दिया, "अगर पैसे खत्म हो गए हैं, तो अपने पशुओं के बदले अनाज ले जाओ।" इस प्रकार, यूसुफ ने उनके घोड़ों, भेड़-बकरियों, गाय-बैलों और गधों के बदले उन्हें अनाज दिया। उस वर्ष, उसने उनके सभी पशुओं के बदले उन्हें भोजन प्रदान किया।
अगले वर्ष, वे फिर यूसुफ के पास आए और बोले, "हमारे पास पैसे नहीं हैं, पशु भी नहीं बचे। अब हमारे पास देने के लिए केवल हमारी देह और हमारी भूमि ही बची है। क्या हम और हमारी ज़मीन तेरे गुलाम बनकर भूखों न मरें? हमें अनाज दे, और हम और हमारी भूमि फिरौन की हो जाएगी।"
यूसुफ ने उनकी बात मान ली। उसने मिस्र की सारी भूमि फिरौन के लिए खरीद ली, क्योंकि अकाल के कारण हर किसान ने अपनी ज़मीन बेच दी। इस प्रकार, पूरा मिस्र फिरौन का हो गया। यूसुफ ने लोगों को नगर-नगर में बसा दिया। केवल याजकों की भूमि ही उनके पास रह गई, क्योंकि याजकों को फिरौन से निश्चित भोजन मिलता था, इसलिए उन्हें अपनी ज़मीन बेचने की आवश्यकता नहीं पड़ी।
फिर यूसुफ ने लोगों से कहा, "देखो, मैंने आज तुम्हारी भूमि फिरौन के लिए खरीद ली है। यहाँ बीज है, इसे खेत में बो दो। जब फसल तैयार होगी, तो तुम फिरौन को पाँचवाँ भाग दोगे और बाकी चार भाग तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के लिए होंगे।"
लोगों ने कहा, "तूने हमारा जीवन बचाया है! हम फिरौन के दास बनकर प्रसन्न हैं।" इस प्रकार, यूसुफ ने मिस्र में एक नियम बना दिया कि आज तक फिरौन की भूमि का पाँचवाँ भाग उसे दिया जाता है, केवल याजकों की भूमि ही इससे अलग रही।
इस बीच, इस्राएल के परिवार ने गोशेन प्रदेश में अपना डेरा जमा लिया। वहाँ वे फले-फूले और उनकी संख्या बहुत बढ़ गई। याकूब मिस्र में सत्रह वर्ष तक रहा। जब उसके जीवन के दिन पूरे होने लगे, तो उसने यूसुफ को बुलाकर कहा, "यदि मैं तेरी दृष्टि में अनुग्रह पा गया हूँ, तो अपना हाथ मेरी जाँघ के नीचे रखकर प्रतिज्ञा कर कि मुझे मिस्र में दफ़नाने नहीं, बल्कि मेरे पूर्वजों के संग कब्र में रखोगे।" यूसुफ ने कहा, "जैसा तू कहता है, वैसा ही करूँगा।" याकूब ने कहा, "मेरी शपथ खा।" और यूसुफ ने उसकी शपथ खाई। तब इस्राएल (याकूब) ने आशीर्वाद पाकर विश्राम किया।
इस प्रकार, यूसुफ ने न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे मिस्र देश की देखभाल की। परमेश्वर की योजना के अनुसार, उसने अकाल के समय सभी को जीवित रखा और इस्राएल के वंश को सुरक्षित स्थान प्रदान किया।