**नेहम्याह की प्रार्थना और यरूशलेम की दुर्दशा**
उस समय फारस के महान राजा अर्तक्षत्र के शासनकाल में नेहम्याह, जो कि शूशन राजमहल में एक प्रतिष्ठित पद पर आसीन था, अपने भाई हनानी और कुछ यहूदियों के साथ बैठा हुआ था। हनानी यरूशलेम से अभी-अभी लौटा था, और उसके चेहरे पर गहरी चिंता के भाव थे। नेहम्याह ने उससे पूछा, "भाई, यरूशलेम और हमारे बचे हुए भाइयों का क्या हाल है?"
हनानी ने दुखी स्वर में उत्तर दिया, "जो लोग वहाँ बंधुआई से बचकर लौटे हैं, वे बड़ी मुसीबत में हैं। यरूशलेम की शहरपनाह टूटी हुई है, और उसके फाटक जलकर राख हो चुके हैं। हमारे शत्रु चारों ओर से हमें धमका रहे हैं, और हमारे लोग निराश और भयभीत हैं।"
यह सुनकर नेहम्याह का हृदय टूट गया। वह बैठ गया और रोने लगा। कई दिनों तक वह शोक में डूबा रहा, उपवास करता रहा और स्वर्ग के परमेश्वर के सामने प्रार्थना करने लगा।
### **नेहम्याह की हृदयस्पर्शी प्रार्थना**
नेहम्याह ने अपने घुटनों के बल बैठकर प्रार्थना की:
"हे स्वर्ग के परमेश्वर, हे महान और भययोग्य प्रभु, तू जो अपने वाचा को पूरा करता है और जो तुझसे प्रेम रखते हैं तथा तेरी आज्ञाओं का पालन करते हैं, उन पर करुणा बनाए रखता है। कृपा करके अपना कान लगा और अपनी आँखें खोलकर देख कि तेरा दास नेहम्याह क्या प्रार्थना कर रहा है। मैं तेरे दास इस्राएल के लिए दिन-रात बिनती करता हूँ। हमने तेरे विरुद्ध पाप किया है, मैं और मेरे पिता के घराने ने पाप किया है। हमने तेरे सामने बुराई की है और तेरे दास मूसा की दी हुई आज्ञाओं, विधियों और नियमों को नहीं माना।"
नेहम्याह का स्वर काँप रहा था, और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। वह जानता था कि इस्राएल का पतन उनके अपने पापों का परिणाम था। फिर भी, वह परमेश्वर की दया की याचना करता रहा:
"कृपया उस वचन को स्मरण कर जो तूने अपने दास मूसा से कहा था—'यदि तुम विश्वासघात करोगे, तो मैं तुम्हें जाति-जाति में तितर-बितर कर दूँगा। परन्तु यदि तुम मेरी ओर फिरोगे और मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे, तो चाहे तुम आकाश के छोर पर भी हों, मैं तुम्हें वहाँ से इकट्ठा करके उस स्थान पर ले आऊँगा जहाँ मैं अपना नाम ठहराना चाहता हूँ।' हे प्रभु, ये लोग तेरे दास हैं, तेरी प्रजा है, जिसे तूने अपनी महान शक्ति और बलवन्त हाथ से छुड़ाया है। हे प्रभु, मेरी प्रार्थना पर ध्यान दे, और उन सभी की प्रार्थनाओं पर जो तेरे नाम का भय मानते हैं। मुझे आज अनुग्रह दिखा, ताकि मैं राजा के सामने कृपा पाऊँ।"
नेहम्याह ने अपनी प्रार्थना पूरी की और उठ खड़ा हुआ। उसका मन अब दृढ़ था। वह जानता था कि परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना सुन ली है। अब वह राजा के सामने जाने के लिए तैयार था, क्योंकि उसे विश्वास था कि यहोवा उसके साथ होगा।
### **परमेश्वर की योजना का आरम्भ**
नेहम्याह की यह प्रार्थना केवल शब्द नहीं थी, बल्कि एक ऐसी लौ थी जिसने उसके हृदय में यरूशलेम के पुनर्निर्माण की आग जला दी। वह जानता था कि परमेश्वर ने उसे इसी कार्य के लिए चुना है। अब उसे केवल साहस के साथ आगे बढ़ना था।
इस प्रकार नेहम्याह की यात्रा शुरू हुई—एक ऐसी यात्रा जो न केवल यरूशलेम की दीवारों को बनाने के लिए थी, बल्कि परमेश्वर के लोगों के विश्वास को फिर से स्थापित करने के लिए भी थी। और यह सब एक हृदय की गहरी प्रार्थना से आरम्भ हुआ था।
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