# **दाऊद का मंदिर के लिए तैयारी करना (1 इतिहास 22)**
## **भूमिका**
यरूशलेम के ऊँचे पहाड़ों पर स्थित दाऊद के महल में एक शांत सुबह थी। सूरज की पहली किरणें राजमहल के सुनहरे शिखरों को चमका रही थीं, और हवा में प्रभु की स्तुति के गीत गूँज रहे थे। राजा दाऊद अपने कक्ष में खड़े थे, उनकी आँखें यरूशलेम की ओर टिकी हुई थीं। उनका हृदय एक गहरी इच्छा से भरा हुआ था—प्रभु परमेश्वर के लिए एक भव्य मंदिर बनाने की इच्छा। परन्तु प्रभु ने उनसे कहा था, *"तू मेरे नाम का घर बनवाने वाला नहीं, क्योंकि तू युद्धों का पुरुष रहा है और तू ने रक्त बहाया है"* (1 इतिहास 22:8)। यह सुनकर दाऊद ने स्वीकार किया कि उनका पुत्र सुलैमान ही इस पवित्र कार्य को पूरा करेगा।
## **दाऊद की तैयारी**
दाऊद ने अपने हृदय में ठान लिया कि यद्यपि वे स्वयं मंदिर नहीं बना सकते, फिर भी वे अपने पुत्र सुलैमान के लिए सभी आवश्यक सामग्री एकत्र करेंगे। उन्होंने अपने सेवकों को बुलाया और आज्ञा दी कि देश के सभी कुशल कारीगरों, लोहारों, बढ़ईयों और राजमिस्त्रियों को इकट्ठा किया जाए।
फिर दाऊद ने अपने राज्य के भंडारों को खोला। उन्होंने असंख्य सोने-चाँदी के सिक्के, कीमती पत्थर, और लबानोन के देवदार की लकड़ी इकट्ठा की। उन्होंने कहा, *"मेरा पुत्र सुलैमान अभी छोटा और अनुभवहीन है, परन्तु यह भवन महान होगा, क्योंकि यह मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि स्वयं परमेश्वर यहोवा के लिए बनाया जाएगा!"*
## **सुलैमान को आशीर्वाद**
एक दिन, दाऊद ने अपने पुत्र सुलैमान को अपने पास बुलाया। सुलैमान एक युवा था, परन्तु उसकी आँखों में बुद्धि और समझदारी चमक रही थी। दाऊद ने उसके कंधों पर हाथ रखकर कहा, *"मेरे पुत्र, मैंने यहोवा के नाम के लिए एक मंदिर बनाने की इच्छा की थी, परन्तु परमेश्वर ने मुझसे कहा कि तू ही उसका निर्माण करेगा। अब सुन, मैंने सोना, चाँदी, पीतल, लोहा, लकड़ी और पत्थर तैयार किए हैं। तू और भी जोड़ लेना, क्योंकि यह कार्य बहुत बड़ा है।"*
सुलैमान ने विनम्रता से सिर झुकाया और कहा, *"पिताजी, मैं इस महान कार्य को कैसे पूरा कर पाऊँगा? मैं तो अभी इतना छोटा हूँ।"*
दाऊद ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, *"यहोवा तेरा साथ देगा। वह तुझे बुद्धि और समझ देगा, और इस्राएल पर शासन करने की शक्ति प्रदान करेगा। बस, उसकी आज्ञाओं का पालन करना और उसके मार्ग पर चलना।"*
## **लोगों को प्रोत्साहन**
दाऊद ने इस्राएल के सभी प्रधानों और नेताओं को भी बुलवाया। जब वे सभी उपस्थित हुए, तो उन्होंने घोषणा की, *"मेरे पुत्र सुलैमान, जिसे यहोवा ने चुना है, वह प्रभु के मंदिर का निर्माण करेगा। परन्तु यह कार्य केवल उसका नहीं, बल्कि हम सबका है। इसलिए मैं तुम सभी से आग्रह करता हूँ कि तुम अपनी शक्ति और संसाधनों से उसकी सहायता करो।"*
सभी नेताओं ने एक स्वर में उत्तर दिया, *"हम सुलैमान के साथ हैं! हम यहोवा के इस पवित्र कार्य को पूरा करने के लिए अपना सब कुछ देंगे!"*
## **दाऊद की प्रार्थना**
अंत में, दाऊद ने सुलैमान और सभी लोगों के सामने प्रभु के सामने प्रार्थना की: *"हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, तू ही इस्राएल का राजा है। तूने हमारे पूर्वजों से वाचा बाँधी और हमें इस देश में बसाया। अब मैं तेरे सामने अपने पुत्र सुलैमान को सौंपता हूँ। कृपया उसके हृदय को पूर्ण रूप से तेरी ओर लगा दे, ताकि वह तेरी आज्ञाओं को मानते हुए इस भव्य मंदिर का निर्माण कर सके।"*
सभी लोगों ने "आमीन!" कहकर प्रार्थना का समापन किया।
## **निष्कर्ष**
इस प्रकार, राजा दाऊद ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में यहोवा के मंदिर के लिए भरपूर तैयारी की। उन्होंने न केवल भौतिक सामग्री जुटाई, बल्कि सुलैमान और पूरे इस्राएल को आध्यात्मिक रूप से भी तैयार किया। दाऊद का विश्वास और परमेश्वर के प्रति समर्पण आज भी हमें प्रेरणा देता है कि जब हमारी इच्छाएँ परमेश्वर की योजना के अनुरूप न हों, तब भी हम उसके कार्य में सहभागी बन सकते हैं।
*"सो दाऊद ने बहुत सा सामान इकट्ठा करके अपनी मृत्यु से पहले ही मंदिर के निर्माण की तैयारी कर दी।"* (1 इतिहास 22:5)
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