यह उस समय की बात है जब यहूदा का राज्य डगमगा रहा था, जैसे कोई दीपक जिसके बत्ती में तेल न बचा हो। यरूशलेम की गलियों में एक अजीब सी सन्नाटा था, मानो शहर स्वयं अपने अंत की प्रतीक्षा कर रहा हो। राजा यहोयाकीम, योशिय्याह का पुत्र, सिंहासन पर बैठा था, पर उसका मन सिंहासन पर न था। वह स्वेच्छाचारी था, और परमेश्वर की आँखों में वह बुराई करता रहा। उसने नबियों की चेतावनियों को, जो उसके पिता के समय में सम्मानित थीं, कुचलने की कोशिश की। उसने मिस्र के फ़िरौन नेखो को भारी कर चुकाया, जिसने उसे सत्ता दी थी, परन्तु वह कर वहूदा के लोगों की पीठ से निकालता था—उनकी मजदूरी से, उनकी फसलों से, उनकी आशाओं से।
कुछ वर्षों बाद, बेबीलोन का युवा और उग्र राजा नबूकदनेस्सर सामर्थ्य के साथ उठा। वह एक ऐसा तूफान था जो पूर्व से उठा और यहूदा की ओर बढ़ा। यहोयाकीम ने उसकी अधीनता स्वीकार की, पर मन ही मन विद्रोह की योजनाएँ बुनता रहा। तीन वर्ष तक वह गुलामी सहता रहा, फिर उसने बगावत का झंडा उठा लिया। प्रतिक्रिया भयानक थी। नबूकदनेस्सर ने अपनी सेना भेजी, और यहूदा को घेर लिया गया। यहोयाकीम को बेड़ियों में जकड़ कर बेबीलोन ले जाया गया। कहते हैं, उसे ताँबे की बेड़ियाँ पहनाई गईं, और वह यरूशलेम के फाटक से निकलते समय पीछे मुड़कर नहीं देख पाया। शहर की दीवारों पर खड़े लोगों की आँखों में अपमान और डर था।
उसका पुत्र यहोयाकीन, जो अठारह वर्ष का था, राजा बना। वह केवल तीन महीने और दस दिन राज कर पाया। उसने भी वही किया जो परमेश्वर की दृष्टि में बुरा था। वह एक कोमल टहनी की तरह था जो तूफान के सामने टूट गई। नबूकदनेस्सर फिर आया, और इस बार उसने केवल राजा को ही नहीं, बल्कि राजपरिवार, सेनापतियों, लोहारों, बढ़इयों—सभी कुशल हाथों को बंदी बना लिया। यरूशलेम से बारह हज़ार से अधिक लोगों की एक शोकयात्रा निकली, जो अपने घरों, अपनी धरती को पीछे छोड़ रही थी। राजमहल और यहोवा के मंदिर के खजाने लूट लिए गए। सोने के पात्र, जिन पर सुलैमान के समय से भक्ति की मोहर लगी थी, अब बेबीलोन के देवता मरदक के मंदिर में रखे जाने वाले थे।
फिर नबूकदनेस्सर ने यहोयाकीन का चाचा मत्तन्याह राजा बनाया, और उसका नाम बदलकर सिदकिय्याह रखा। वह इक्कीस वर्ष राज करने वाला यहूदा का अंतिम राजा था। उसकी कहानी सबसे दुखद है। वह दुर्बल इच्छाशक्ति का व्यक्ति था, जो सामंतों और दरबारियों के बीच हिलता रहता। उसके सामने यिर्मयाह नबी खड़ा था, जिसके माथे पर चिंता की लकीरें थीं, आवाज में एक अटल दर्द। वह बार-बार कहता, "परमेश्वर की आज्ञा मानो। बेबीलोन के राजा के विरुद्ध विद्रोह न करो। अभी समर्पण कर दो, तो शहर और मंदिर बच जाएँगे।" पर सिदकिय्याह डर गया। उसने अपने चाचों और भाइयों की दुर्गति देखी थी। उसने यिर्मयाह की बात मानने के बजाय, बेबीलोन के विरुद्ध गुप्त संधियाँ करनी शुरू कर दीं, मिस्र से मदद की आशा लगाए रखी।
आखिरकार, उसने विद्रोह कर दिया। नबूकदनेस्सर का धैर्य जवाब दे गया। बेबीलोन की विशाल सेना ने यरूशलेम को घेर लिया। घेराबंदी अठारह महीने चली। शहर के भीतर भुखमरी और महामारी फैल गई। माताएँ अपने ही बच्चों का माँस खाने को मजबूर हो गईं। दीवारों पर पहरेदारों के पैर सूज गए, पर वे गिरने को तैयार न थे। एक रात, जब घेराबंदी और तीव्र हो गई, सिदकिय्याह अपने सैनिकों के साथ राजमहल के एक गुप्त मार्ग से निकल भागा। वह यरीहो की ओर भागा, शायद इस आशा में कि वहाँ से कोई रास्ता मिल जाएगा। पर बेबीलोन की सेना ने उसका पीछा किया। यरीहो के मैदानों में उसे पकड़ लिया गया।
तब जो हुआ, वह इतिहास में एक क्रूर दृश्य के रूप में दर्ज है। उसे रिबला शहर में, नबूकदनेस्सर के सामने ले जाया गया। उसके सामने ही उसके पुत्रों को मार डाला गया। फिर उसकी आँखें फोड़ दी गईं। आखिरी चीज जो उसने देखी, वह थी उसके संतानों का रक्त। ताँबे की बेड़ियों में जकड़ा हुआ, अंधा राजा बेबीलोन की ओर खींचा जाने लगा।
उसके बाद, अवश्यंभावी घटित हुआ। बेबीलोन के सेनापति नबूजरदान यरूशलेम में घुसा। उसने राजमहल, प्रमुख घर, और अंततः—वह स्थान जिसकी पवित्रता को लेकर इतना गर्व था—परमेश्वर का मंदिर, जलाकर राख कर दिया। दीवारें गिरा दी गईं। आग की लपटों में वह सोना पिघल गया जो शेष बचा था। धुआँ आकाश को छूने लगा, मानो स्वयं सृष्टि कराह रही हो। जो बच गए, उन्हें बंदी बना लिया गया। भूमि विरान हो गई, ताकि वह अपने विश्राम के वर्षों का प्रतिफल पा सके, क्योंकि उसे सत्तर वर्ष तक आराम करना था।
परन्तु कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। भविष्यवक्ता यिर्मयाह के शब्दों में एक दबी हुई आशा की किरण थी। वह विनाश अंत नहीं था। बेबीलोन के राजा की मृत्यु के बाद, एक फारसी राजा कुरुश उठा। परमेश्वर ने उसके हृदय को छुआ। उसने एक घोषणा की: "यहोवा, स्वर्ग के परमेश्वर ने पृथ्वी के सारे राज्य मुझे दे दिए हैं, और उसने मुझे आज्ञा दी है कि मैं यरूशलेम में उसके लिये एक मंदिर बनवाऊँ। जो कोई तुम में से उसकी प्रजा हो, वह यरूशलेम को जा सके।"
और इस प्रकार, धूल और राख के बीच से, एक वादा उभरा। जो लोग टूटे हुए थे, वे फिर उम्मीद से देखने लगे। मानो एक गहरी साँस के बाद, जमीन ने फिर से साँस लेना शुरू किया। बंधुआई सजा नहीं, बल्कि एक तरह का शुद्धिकरण थी। परमेश्वर की प्रतिज्ञा अडिग थी, उसकी दया नई-नई बनी रहती है। विनाश के बीच भी, मोचन की योजना चलती रही—धीरे, गहरे, एक नदी की तरह जो रेगिस्तान के नीचे बहती है, और अचानक कहीं दूर एक हरे मैदान में फूट निकलती है।
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