पानी की आवाज़ अब वह भयावह गर्जना नहीं थी जो कभी आकाश और धरती के बीच गूंजती थी। अब बस एक स्थिर, नीरस टपटपाहट थी, जो लकड़ी के मस्तूल से टकराती और नीचे बहती रहती थी। नूह ने अपना माथा जहाज़ की एक खिड़की के पास टिका रखा था। बाहर, सब कुछ धुंधला और ग्रे था – आकाश, पानी, और उस धुंध के पार कहीं दिखती वो अनंत चिकनी सतह, जो कभी पहाड़ों की चोटियां हुआ करती थीं।
उन चालीस दिन और चालीस रातों के बाद, जब आंधी ने अपना सारा क्रोध उड़ेल दिया था, एक अजीब सी शांति छा गई थी। वह शांति भयावह थी। ईश्वर की याद दिलाने वाली हर चीज़ – बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली के तेज झोंके – गायब हो गई थी। अब बस इंतज़ार था। और पानी।
लेकिन फिर, एक दिन, कुछ बदला। नूह ने महसूस किया, शायद उसकी पुरानी हड्डियों ने महसूस किया, कि जहाज़ का झूमर अब उतनी तेज़ी से नहीं घूम रहा था। हवा की दिशा बदली हुई थी, और एक कोमल, गर्म हवा का झोंका अंदर आया, जो महीनों से उसने महसूस नहीं किया था। यह हवा मृत्यु की गंध नहीं लिए हुए थी। यह… ताज़ा थी। ईश्वर ने पृथ्वी पर एक "स्मरण" किया था, जैसा कि वचन कहता है। और उस स्मरण की पहली सांस यही हवा थी।
धीरे-धीरे, बेहद धीरे, पानी उतरना शुरू हुआ। यह कोई अचानक उतराव नहीं था। यह एक थका देने वाला, लगभग अदृश्य सा संकुचन था। पहाड़ों की चोटियाँ, जो मृतकों के सफ़ेद कंकालों की तरह दिखती थीं, धुंध में से उभरने लगीं। पहले सिर्फ़ उनकी टोपियाँ, फिर उनके कंधे। अरारत के पर्वत ने अपना सिर सबसे पहले बाहर निकाला। नूह ने उसे देखा, और उसकी आँखों में आंसू आ गए। यह सिर्फ़ पत्थर और मिट्टी का ढेर नहीं था। यह एक वादा था। जमीन का एक टुकड़ा, ठोस, निश्चित।
इंतज़ार अब और भी कठिन हो गया। पानी और भी धीरे-धीरे उतर रहा था। नूह ने एक कौवे को बाहर भेजा। वह काला पंछी, मजबूत और बेचैन, उड़ गया और लौटकर नहीं आया। वह शायद कहीं मृत जगह पर बैठ गया, या फिर उसने कीचड़ में फंसे किसी जानवर का मांस ढूंढ लिया। कौवा वापस नहीं आया, और उसकी अनुपस्थिति में एक तरह की उम्मीद थी। दुनिया बाहर थी, यहाँ तक कि अगर वह अभी तक रहने लायक नहीं थी।
फिर उसने एक कबूतर भेजा। कोमल, सफेद कबूतर। वह लौट आया, घबराया हुआ, अपने पंख भारी पानी से लदे हुए। उसके पैरों के नीचे कीचड़ के कोई निशान नहीं थे, कोई जैतून की टहनी नहीं थी। सिर्फ़ थकान। नूह ने उसे वापस पिंजरे में रख दिया, और सात और दिन इंतज़ार किया।
दूसरी बार जब कबूतर गया, तो वह संध्या के समय लौटा। और उसकी चोंच में… एक ताज़ी, हरी जैतून की पत्ती थी। वह पत्ती महज एक पत्ती नहीं थी। वह जीवन था। वह ईश्वर का करुणा भरा हस्ताक्षर था, हरे रंग में लिखा हुआ। पृथ्वी ने साँस ली थी। पेड़ों ने अपनी जड़ें कीचड़ से बाहर निकाली थीं और नए पत्ते दिए थे। नूह ने उस पत्ती को हथेली पर रखा, उसकी चिकनी बनावट को महसूस किया। पूरे जहाज़ में एक गुनगुनी, अवर्णनीय खुशी फैल गई। उन जानवरों की आँखों में, जो महीनों से केवल डर और धैर्य देखती आई थीं, एक चमक दौड़ गई।
उसने एक और सात दिन इंतज़ार किया। अब धैर्य आनंद में बदल चुका था। तीसरी बार कबूतर गया, और वह लौटकर नहीं आया। उसकी अनुपस्थिति सबसे मधुर संगीत थी। उसने अपना घोंसला बना लिया था। पृथ्वी ने उसे वापस बुला लिया था।
जब आखिरकार जहाज़ अरारत की चट्टानों से टकराया और स्थिर हुआ, तो वह आघात नहीं था, बल्कि एक आलिंगन जैसा था। पहाड़ ने उन्हें थाम लिया था। पानी सूख गया था। नीचे की धरती गर्म और दृढ़ थी, अभी भी नम, पर चलने लायक।
नूह ने जहाज़ की छत हटाई। सूरज की रोशनी, वास्तविक, गर्म, बिना किसी बादल के रोशनी, सीधे उसके चेहरे पर पड़ी। वह सांस को रोककर खड़ा रहा। हवा में मिट्टी की गंध थी, पानी की गंध थी, और कहीं दूर, शायद खिलते हुए फूलों की एक बूंद भी। उसने अपने परिवार को इकट्ठा किया – शेम, हाम, येफेत, उनकी पत्नियाँ। वे सबके सब चेहरे ऊपर उठाए खड़े थे, आँखें बंद किए, उस गर्मी को अपने अंदर समा रहे थे जो उनकी आत्माओं तक जा रही थी।
फिर, धीरे-धीरे, वह रैंप जो उन्होंने बनाया था, नीचे उतारा। लकड़ी की पट्टी ने पहली बार नई पृथ्वी को छुआ। नूह पहला कदम रखने वाला था। उसका पैर ऊपर उठा, ठहरा, और फिर नीचे उतरा। मिट्टी उसके तलवे के नीचे दबी, नरम पर दृढ़। उसने दूसरा कदम रखा। फिर तीसरा। वह जहाज़ से दूर चला गया, उस धरती पर चलता रहा जो अब उसकी थी, जो सबकी थी।
और फिर वह हुआ जो स्वाभाविक था। नूह ने एक वेदी बनाई। साधारण पत्थरों को, जो बाढ़ के पानी से चिकने हो गए थे, उसने एक पर एक रखा। उसने जो कुछ बचा था, उसमें से शुद्ध जानवरों में से कुछ को लिया, और भेंट चढ़ाई। यह कोई दिखावा नहीं था, न ही डर से किया गया कोई कर्मकांड। यह दिल से निकली एक सहज प्रतिक्रिया थी – कृतज्ञता की, विस्मय की, एक ऐसे प्रेम की जिसका कोई शब्द नहीं था।
और यहोवा ने वह सुगंध ग्रहण की। और उसने अपने मन में कहा: "मैं फिर मनुष्य के कारण पृथ्वी को शाप नहीं दूंगा... न ही फिर कभी सब प्राणियों को नष्ट करूंगा।"
तब आकाश में एक चिन्ह दिखाई दिया। बादलों के बीच से, रंगों का एक चाप फैला – लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, नील, बैंगनी। इंद्रधनुष। यह कोई साधारण प्राकृतिक घटना नहीं थी। यह एक वाचा थी, आकाश और पृथ्वी के बीच खिंचा हुआ एक दिव्य वादा। यह याद दिलाने के लिए कि जल फिर कभी सब कुछ नष्ट नहीं करेगा। हर बार जब बादल छाएंगे, यह चाप दिखेगा, और ईश्वर को अपनी प्रतिज्ञा याद आएगी।
नूह ने उस रंगीन प्रकाश को अपने गंभीर, झुर्रियों भरे चेहरे पर पड़ते हुए महसूस किया। वह जानता था कि दुनिया अब वैसी नहीं रही जैसी बाढ़ से पहले थी। उसमें एक नाजुकता आ गई थी, एक स्मृति। लेकिन उसमें एक नई दया भी थी, एक नई शुरुआत का वादा। उसने अपने चारों ओर देखा – अपने बेटों को, जो नई धरती पर हैरानी से घूम रहे थे; उन जानवरों को, जो डरते-डरते, फिर उत्साह से अपने-अपने रास्ते निकल रहे थे। और उसने महसूस किया कि यह सब, हर धड़कन, हर सांस, उस रंगीन वाचा के नीचे सुरक्षित था। बारिश अब भी आएगी, पर वह जीवन देगी, मृत्यु नहीं। और यही नई दुनिया का पहला सबक था।
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