बाइबल की कहानी

पहिलौठे की अंतिम रात

रात का अँधेरा मिस्र की धरती पर एक भारी चादर-सा लिपटा हुआ था। हवा में एक अजीब-सा सन्नाटा था,...

पवित्र बाइबल

रात का अँधेरा मिस्र की धरती पर एक भारी चादर-सा लिपटा हुआ था। हवा में एक अजीब-सा सन्नाटा था, जैसे किसी बड़ी आहट को सुनने के लिए प्रकृति स्वयं रुकी हुई हो। नील नदी का पानी भी धीमी गति से बह रहा था, मानो डर के मारे उसकी कलकल भी दब गई हो। राजमहल के स्तंभों के पीछे मशालों की लपटें लरज रही थीं, और उनकी छायाएँ दीवारों पर एक अशुभ नृत्य करती प्रतीत होती थीं।

मूसा ने अपने चेहरे पर थकान के गहरे निशान महसूस किए। वर्षों की यह टकराव, फिरौन के हठ, और लोगों की पीड़ा—सब कुछ एक निर्णायक बिंदु पर पहुँच चुका था। उसकी आँखों में एक गहरी उदासी थी, परन्तु उसके कदमों में दृढ़ता। वह जानता था कि अब जो कहने जा रहा है, वह सब कुछ बदल देगा। उसके पीछे हारून चुपचाप खड़े थे, उनके हाथ में वह साधारण सा लाठी थी जो इतने चमत्कारों की साक्षी बन चुकी थी।

महल के भीतर का वातावरण गर्म और गंध से भरा था—सुगंधित तेलों की भीनी महक और पसीने की तीखी गंध का मिश्रण। फिरौन अपने सिंहासन पर टिका बैठा था, उसके चेहरे पर अहंकार और थकान की एक विचित्र मिलावट थी। उसके आस-पास के दरबारी स्तब्ध और भयभीत थे। उन्होंने खून-सा लाल पानी देखा था, मेंढकों की बाढ़ झेली थी, मक्खियों के काले बादलों को, मवेशियों की मृत्यु को, फोड़ों की विभीषिका को, ओलों के कहर को, टिड्डियों की तबाही को, और तीन दिन के घने अँधेरे को। पर फिरौन का हृदय पत्थर-सा बना रहा।

मूसा ने अपनी आवाज़ को स्थिर रखा, पर उसमें एक ऐसी गूँज थी जो हृदय की गहराई से निकलती है। "यहोवा यह कहता है: 'आधी रात के समय मैं मिस्र के बीच में से निकलूँगा। और मिस्र में पहिलौठा, जो सिंहासन पर बैठे फिरौन से लेकर दासी के पहिलौठे, और पशुओं के सब पहिलौठे तक होगा, वह मर जाएगा।'"

उसके शब्द हवा में लटक गए, जैसे पत्थर की शिला हो। महल में कोई हलचल नहीं हुई, कोई साँस तक नहीं रुकी, ऐसा लगा जैसे सबकी साँसें पहले ही रुक गई हों। फिरौन की आँखें संकरी हुईं, उसके होंठ कठोर रेखा में दब गए। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। उसकी चुप्पी ही उसका जवाब थी।

"परन्तु," मूसा ने आगे कहा, उसकी आवाज़ थोड़ी कोमल हुई, पर दृढ़ता में कमी नहीं आई, "इस्राएल के बच्चों के बीच एक कुत्ता भी भौंकेगा नहीं। ताकि तू जान ले कि यहोवा मिस्रियों और इस्राएलियों के बीच भेद करता है। और तेरे ये सब सेवक मेरे पास आकर भूमि पर गिरकर प्रार्थना करेंगे, कि तू और तेरी सब प्रजा जाए। उसके बाद ही मैं जाऊँगा।"

यह कहकर मूसा ने फिरौन को एक अंतिम, गहरी नज़र से देखा। उस नज़र में क्रोध नहीं, विजय का अहंकार नहीं, बल्कि एक विषादपूर्ण चेतावनी थी। फिर वह मुड़ा, और हारून के साथ धीमे, गंभीर कदमों से उस भव्य दरबार को पीछे छोड़ते हुए चला गया। उसके जाते ही वहाँ का वातावरण और भी दबा हुआ, और भी भारी लगने लगा।

मूसा महल से बाहर निकला तो रात का सन्नाटा और भी गहरा लगा। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे, मानो स्वयं ईश्वर की आँखें नीचे देख रही हों। गोशेन के मार्ग पर चलते हुए, जहाँ इस्राएली रहते थे, हवा का स्वर भी बदला हुआ महसूस होता था। वहाँ अँधेरा भी कम गहरा लगता, हवा में भी हल्की-सी मधुरता थी। लोग अपने-अपने घरों में थे, कुछ बातचीत कर रहे थे, कुछ चुपचाप प्रार्थना में बैठे थे। मूसा के हृदय में एक अजीब-सी पीड़ा थी। वह जानता था कि जो आने वाला है, वह भयानक होगा। यह कोई साधारण विपत्ति नहीं थी; यह न्याय का एक अंतिम, भीषण कार्य था।

वह अपने डेरे में लौट आया। बाहर, मिस्र की रात अपनी पूरी निश्छलता में फैली हुई थी। कहीं किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ नहीं आई। सब कुछ इतना शांत था कि दिल की धड़कन सुनाई देती प्रतीत होती थी। मिस्र के घरों में, उन भव्य हवेलियों और दीन झोपड़ियों में, पहिलौठे बेख़बर सो रहे थे। फिरौन का पुत्र, जो भविष्य का राजा था, अपने मखमली बिस्तर पर गहरी नींद में था। खलिहानों में जनवरों के झुंड में भी सन्नाटा पसरा हुआ था।

मूसा ने आकाश की ओर देखा। आधी रात निकट आ रही थी। एक ऐसी घड़ी जब समय और अनंत काल का मिलन होता है। वह जानता था कि यहोवा का वचन पूरा होगा। उसने अपनी आँखें मूँद लीं। उस रात का अंतिम पहर, मिस्र के इतिहास का सबसे काले अध्याय की प्रतीक्षा में, बड़ी धीमी गति से बीत रहा था। और सब कुछ सुनने को तैयार था—वह आहट, जो हर पहिलौठे के कमरे की दहलीज़ पर दस्तक देने वाली थी।