यरूशलेम की सुबह थी, ओस से भीगी हुई। राजमहल के पत्थरों पर सूरज की पहली किरणें फिसल रही थीं, पर उसके भीतर का वातावरण अजीब सा भारी था। योआश, जो सात वर्ष की आयु से ही राजा बना बैठा था, अब जवान हो चला था। पर उसकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो उसके बचपन में, यहोयादा याजक के सान्निध्य में दिखती थी। यहोयादा अब बूढ़ा हो गया था, उसकी दाढ़ी सफेद हो चली थी, पर उसकी आवाज में अब भी वही दृढ़ता थी।
उस दिन, योआश ने महल के ऊपरी कक्ष से नगर को देखा। यहोयादा के साथ। मंदिर, जो एक समय दाविद और सुलैमान के युग में इतना भव्य हुआ करता था, अब उपेक्षा से जर्जर हो रहा था। उसकी लकड़ी के दरवाजे टूटे हुए थे, दीवारों पर जगह-जगह से पलस्तर उखड़ गया था।
"देख रहे हो न, महाराज?" यहोयादा ने कहा, उसकी आवाज में एक गहरी पीड़ा थी। "यह घर, जो परमेश्वर का है, उसकी यह दशा। तुम्हारी दादी, अथल्याह ने, न केवल राजवंश को मिटाने की कोशिश की, बल्कि परमेश्वर के घर को भी भुला दिया। लोग बाल की उपासना में लग गए। अब समय आ गया है कि इसकी मरम्मत की जाए।"
योआश ने गहरी सांस ली। यहोयादा के शब्द उसके दिल में उतर गए। उसने एक योजना बनाई। उसने यहोयादा को आदेश दिया कि एक संदूक बनवाया जाए, और उसे मंदिर के बाहर, दाएं तरफ रखवा दिया। फिर, यरूशलेम और यहूदा के सभी नगरों में यह घोषणा करवाई गई कि जो कुछ भी मूसा की व्यवस्था के अनुसार परमेश्वर के घर के लिए दिया जाता है, उसे लाकर उस संदूक में डाला जाए।
पहले-पहल तो लोगों ने उत्साह दिखाया। प्रजा के प्रमुख और सामान्य जन, सभी आने लगे। चांदी के सिक्के, सोना, और अन्य दान। संदूक भरने लगा। पर कुछ समय बाद, एक अजीब सी ढिलाई छा गई। मंदिर के पुरोहित और हाकिम, जिन पर इस कार्य की जिम्मेदारी थी, उदासीन हो गए। वे संदूक को तो खोलते, गिनते, पर काम की गति मंद पड़ गई। शायद उनका मन लग नहीं रहा था। शायद उन्होंने इसे महज एक औपचारिकता समझ लिया था।
योआश को यह बात पता चली तो उसका चेहरा गुस्से से तमतमा गया। उसने यहोयादा को बुलवाया, पर अब तक बूढ़े याजक का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ चुका था। फिर भी, राजा ने एक सभा बुलाई। यहोयादा के पुत्रों और प्रमुख लेवियों को उपस्थित किया गया।
"सुनो," योआश की आवाज में एक नई तल्खी थी, "यह क्या हुआ? मैंने परमेश्वर के घर की मरम्मत का आदेश दिया था। तुम लोग इसे क्यों नहीं कर रहे? यह संदूक भरता जा रहा है, पर तुम लोग कारीगरों को मजदूरी क्यों नहीं दे रहे? लकड़ी और पत्थर क्यों नहीं मँगवा रहे?"
एक असहज सी खामोशी छा गई। फिर यहोयादा के एक पुत्र ने, जिसका नाम जकर्याह था, सिर झुकाकर कहा, "महाराज, हमने कोशिश की... पर लोगों का उत्साह ठंडा पड़ गया है। प्रबंध में भी कुछ कमी रह गई।"
"अब ऐसा नहीं चलेगा," योआश ने दृढ़ता से कहा। "संदूक को अब मंदिर के भीतर नहीं रखा जाएगा। इसका प्रबंध सीधे तुम लोग करोगे। हर एक चांदी का सिक्का, हर एक दान, सीधे कारीगरों और सामग्री खरीदने में लगेगा। कोई बीच का व्यवधान नहीं होगा।"
इस फैसले से काम में जान आ गई। संदूक को नियमित रूप से खोला जाने लगा, चांदी गिनी जाने लगी, और कारीगरों के हाथों में औजार चलने लगे। बढ़ई, राजगीर, लोहार - सभी लग गए। टूटे हुए दरवाजे बदले गए, दीवारों को नए पत्थरों से सजाया गया, भीतर की साज-सज्जा फिर से चमक उठी। यह देखकर योआश के मन को शांति मिली। उसे लगा कि उसने अपने संरक्षक यहोयादा का सपना पूरा किया है, और परमेश्वर की इच्छा पर चला है।
पर जीवन का एक नियम है - कुछ लोग विपत्ति में तो अच्छे रहते हैं, पर सफलता उनके चरित्र को खा जाती है। यहोयादा की मृत्यु एक सौ तीस वर्ष की आयु में हुई। उसे दाविद के नगर में, राजाओं की कब्रों के बीच, सम्मानपूर्वक दफनाया गया। उस दिन यरूशलेम में एक गहरा शोक था। योआश भी रोया। पर उस रोने के पीछे क्या था, यह तो समय ही बताने वाला था।
यहोयादा के जाने के बाद, योआश के आसपास नए लोग आने लगे। यहूदा के कुछ प्रमुखों ने, जो पहले दबे रहते थे, अब राजा के कान भरने शुरू किए। "महाराज," वे कहते, "अब आप पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं। यहोयादा तो एक याजक था, उसने आपको बंधन में रखा। अब तो आप जो चाहें, कर सकते हैं।"
और धीरे-धीरे, योआश का हृदय बदलने लगा। वह उन बातों को भूलने लगा जो यहोयादा ने उसे सिखाई थीं। वह अशेरा और बाल की मूर्तियों के पास जाने लगा। जब भी कोई उसे टोकता, वह गुस्से में आ जाता।
फिर एक दिन, वही जकर्याह, यहोयादा का पुत्र, जो अब एक याजक था, मंदिर के प्रांगण में खड़ा होकर लोगों से बोला। उसके चेहरे पर उसके पिता जैसा ही दृढ़ संकल्प था। "परमेश्वर यहूदा और यरूशलेम से यह पूछता है," उसकी आवाज गूँजी, "तुम लोग उसकी आज्ञाएँ क्यों त्याग रहे हो? उसने तुम्हें छोड़ दिया है, इसलिए उसने भी तुम्हें छोड़ दिया है!"
ये बातें योआश के कानों तक पहुँचीं। पर अब का योआश वह नहीं था जो यहोयादा की छत्रछाया में पला था। उसे जकर्याह की बातें एक चुनौती लगीं। गुस्से में अंधा होकर, उसने आदेश दिया कि जकर्याह को पकड़कर मंदिर के प्रांगण में ही पत्थरवाह कर दिया जाए।
वह दृश्य बहुत भयानक था। जकर्याह, जिसके पिता ने योआश को बचाया और पाला था, अब राजा के आदेश पर पत्थर खा रहा था। मरते समय, उसने कहा, "परमेश्वर इसका हिसाब लेगा।"
और परमेश्वर ने हिसाब लिया। उसी वर्ष के अंत में, अराम का एक छोटा सा दल यरूशलेम पर चढ़ आया। योआश की सेना, जो संख्या में बहुत बड़ी थी, पराजित हुई। अरामी सैनिकों ने यरूशलेम में घुसकर बहुत कुछ लूटा, और सभी प्रमुखों को मार डाला। योआश स्वयं बुरी तरह घायल हो गया।
वह अपने शयनकक्ष में पड़ा था, जीवन के अंतिम क्षण गिन रहा था। उसके अपने ही सेवक, जिनके पिता का वध जकर्याह के खून के बदले में हुआ था, उसके पास आए। उनके चेहरे पर कोई दया नहीं था, केवल न्याय का एक ठंडा संकल्प। उन्होंने उसी के बिस्तर पर, उसी की मृत्यु के लिए, उसे मार डाला।
उसे दफनाया तो गया, पर दाविद के नगर में नहीं। राजाओं की कब्रों में नहीं। एक साधारण सी कब्र में। उसका पुत्र अमस्याह उसके स्थान पर राजा बना। इतिहास की किताबों में योआश का नाम तो रह गया, पर उसकी कहानी एक चेतावनी बनकर - कि कैसे एक अच्छी शुरुआत भी, अगर हृदय में स्थिरता न हो, तो बुरे अंत में बदल जाती है। और यरूशलेम की दीवारें, एक बार फिर उस इतिहास को अपने पत्थरों में समेटे, चुपचाप खड़ी रहीं।
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