भजन संहिता 62 पुराना नियम

शरण शिला की अटूट शांति

वह दिन ऐसा था जैसे पहाड़ों ने आकाश को निगल लिया हो। घने, स्लेटी बादलों ने सूरज की सांस रोक दी...

भजन संहिता 62 - शरण शिला की अटूट शांति

वह दिन ऐसा था जैसे पहाड़ों ने आकाश को निगल लिया हो। घने, स्लेटी बादलों ने सूरज की सांस रोक दी थी, और हवा में एक ठंडी, चुप्पी बिछी थी। अनील अपनी झोंपड़ी के बाहर बैठा, एक पुरानी चट्टान पर हाथ फेर रहा था। उसकी उम्र के धागे पचास साल से ऊपर बँध चुके थे, पर आज उसका मन बिलकुल खाली था। गाँव वालों की बातें, जिनमें उसके खेत के बँटवारे को लेकर षड्यंत्र की सनसनी थी, उसके कानों में गूँज रही थीं। वे शब्द नहीं, बल्कि मन के भीतर की दरारें बन गए थे।

उसने आँखें बंद कीं। स्मृतियों का एक झरना टूट पड़ा – बचपन में पिता का हाथ पकड़कर इसी पहाड़ी पर चढ़ना, जब वे कहते थे, "देख, अनील, यह चट्टान... हज़ारों साल से यहीं है। बारिश हो, आँधी आए, यह हिलती नहीं।" पर आज? आज तो उसकी अपनी धरती, उसकी जड़ें ही हिल रही थीं। एक गहरी थकान, न किसी माँसपेशियों की, बल्कि आत्मा की थकान, उसे घेरे हुए थी।

तभी दूर से एक बाज की तीखी आवाज आई। उसने आँखें खोलीं। एक बाज, जिसके पंखों पर बादलों की सिलवटें सी पड़ी थीं, हवाओं से लड़ता हुआ, उस चट्टानी शिखर पर जा बैठा, जो गाँव के पूरब में एक अकेला खम्भा-सा खड़ा था। वह शिखर, जिसे स्थानीय लोग 'शरण-शिला' कहते थे। बाज बिलकुल निश्चल बैठा रहा, हवाओं का झोंका भी उसे टस से मस न कर सका।

उस पल, अनील के मन में शब्द उमड़े, बिना किसी व्याकरण के, बिना किसी योजना के। वह एक प्रार्थना नहीं, एक विस्मय की साँस थी: "मेरी आत्मा की शांति तो बस उसी एक में है... वही मेरी चट्टान, मेरी मुक्ति, मेरा गढ़ है। मैं ज्यादा नहीं डगमगाऊँगा।"

वह उठा। पैर उस चट्टानी रास्ते पर चल पड़े, जो शरण-शिला की ओर जाता था। रास्ता कठिन था, कंकड़ उसके चप्पलों में चुभते, झाड़ियाँ उसे रोकना चाहतीं। हर कदम पर उसे अपने विरोधियों के चेहरे याद आते – चाचा का कपटभरा मुस्कुराहट, पड़ोसी की कानाफूसी। वे सब, उसकी नज़र में, "झूठा धक्का देने वाली एक टूटी दीवार" बन गए थे। वे दिखते तो मजबूत थे, पर थे खोखले। उनकी चालों में कोई स्थिरता नहीं थी, बस एक ढोंग था।

वह चढ़ता गया। साँय-साँय करती हवा अब उसे डराने की बजाय, उसके मन के भार को हल्का कर रही थी। वह सोचने लगा – इन सभी लोगों की दोस्ती, इनकी योजनाओं का खेल, इनकी बढ़ती-घटती कृपा... यह सब कितना क्षणभंगुर है। एक पल में ये तारीफ करते हैं, दूसरे पल में गिराने पर तुले रहते हैं। यह सब तो धोखा है, जैसे हल्की हवा में उड़ता तिनका।

शिखर के नीचे पहुँचकर उसने सिर उठाया। चट्टान विशाल, निश्चल, अडिग खड़ी थी। उसने अपना हाथ उसकी ठंडी, खुरदरी सतह पर रखा। यह हिलती नहीं थी। यह बदलती नहीं थी। और फिर वह शब्द, उसके भीतर से, एक गूँज की तरह फूट पड़े: "ताकत तो बस परमेश्वर की है। दया भी उसी की है। वही हर एक को उसके काम का फल देगा।"

उस पल, बादलों के बीच से सूरज की एक किरण निकली और सीधे उस चट्टान के शिखर को चूम लिया। सोने जैसी चमक बिखर गई। अनील की आँखों में पानी आ गया। यह कोई नाटकीय अद्भुत चमत्कार नहीं था। न ही आकाशवाणी हुई थी। बस, एक साधारण सी सच्चाई, जो हमेशा से वहाँ थी, उसने अपने पूरे वजन के साथ उसके मन में डेरा डाल लिया। उसकी उलझन, उसका डर, उसका क्षोभ – यह सब उस अडिग, अटल सत्य के सामने धुंधला पड़ गया। उसके भीतर की वह 'टूटी दीवार' ढह गई, और उसकी जगह एक नई नींव पड़ गई, जो हिलने वाली नहीं थी।

वह नीचे उतरा तो सूरज पूरी तरह बादलों से बाहर आ चुका था। गाँव की ओर जाते हुए, उसके कदमों में वही पुरानी भारीपन नहीं था। उसे याद आया कि कैसे वह सुबह-सुबह अपने धन-जन की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहता था। आज उसे एहसास हुआ कि असली सम्पदा, असली भरोसा, वह नहीं था जो इंसानों के हाथ में है। वह तो वह शक्ति थी, वह दया थी, जो उस चट्टान के पीछे, उस आकाश के पार, सदा से विद्यमान थी।

झोंपड़ी में लौटकर उसने दीवार पर टँगी अपने पिता की तस्वीर की ओर देखा और मुस्कुरा दिया। उस रात, जब अँधेरा घिर आया और गाँव में फिर किसी की फुसफुसाहट उठी, तो अनील अपने खाट पर लेटा, अपनी साँसों को शांत होते हुए सुनता रहा। उसका मन अब उन आवाजों के पीछे नहीं भागता था। वह तो उस शांति में टिका हुआ था, जो चट्टान के कोर में निवास करती है – न कभी डगमगाने वाली, न कभी थकने वाली। भजन का वह अंतिम वाक्य उसके होंठों पर एक प्रार्थना बनकर रह गया, जो धीरे-धीरे नींद में डूब गया: "तू, हे परमेश्वर, दया करता है, और हर एक को उसके काम का फल देता है।" और उसकी नींद, बिलकुल गहरी और अटूट थी, जैसे कोई शरण पाकर सो गया हो।

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