यशायाह अध्याय १९ के आधार पर एक विस्तृत कहानी:
मिस्र की धरती पर भयंकर संकट छाया हुआ था। नील नदी का जल सूखने लगा था और उसका प्रवाह धीमा पड़ गया था। नदी के तट पर बसे गाँवों के लोग भयभीत होकर एकत्रित हुए। वे देख रहे थे कि कैसे मिस्र की जीवनरेखा कही जाने वाली यह नदी दिनोंदिन सिकुड़ती जा रही थी।
मिस्र के मंदिरों में पुजारी घबराए हुए थे। वे अपने देवताओं से प्रार्थना कर रहे थे, पर कोई उत्तर नहीं मिल रहा था। राजमहल में फिरौन बैठा था, उसके चेहरे पर चिंता की गहरी रेखाएँ थीं। उसने अपने ज्योतिषियों और बुद्धिमानों को बुलाया, पर कोई भी इस संकट का समाधान नहीं बता पा रहा था।
तभी एक दिन, यहोवा परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य प्रकट की। उसने मिस्र के लोगों के हृदयों को छूना आरंभ किया। प्रारंभ में भ्रम और अशांति फैली। लोग एक-दूसरे से लड़ने लगे, नगर-नगर में संघर्ष छिड़ गया। परन्तु यहोवा की योजना कुछ और ही थी।
धीरे-धीरे मिस्र के लोगों ने महसूस किया कि उनके मूर्ति देवता निर्जीव हैं। वे समझने लगे कि केवल यहोवा ही सच्चा परमेश्वर है। इस ज्ञान के प्रकाशन के साथ ही एक अद्भुत परिवर्तन आरंभ हुआ।
मिस्र के पाँच नगरों के लोगों ने सर्वप्रथम यहोवा की वाणी को स्वीकार किया। उनमें से एक नगर को "निर्वासन का नगर" कहा जाने लगा, क्योंकि वहाँ परमेश्वर के लोग शरण लेते थे। मिस्रवासी यहोवा के लिए वेदी बनाने और उसके लिए स्तंभ खड़े करने लगे।
फिर एक दिन ऐसा हुआ कि मिस्र, अश्शूर और इस्राएल - तीनों देशों के लोग एक साथ यहोवा की आराधना करने लगे। वे सब मिलकर परमेश्वर की प्रशंसा करते, एक-दूसरे का आदर करते। मिस्र के लोग इस्राएल के परमेश्वर के लोग बन गए और अश्शूर के लोग भी यहोवा की सेवा करने लगे।
यहोवा ने मिस्र को आशीष दी, जैसे वह इस्राएल को आशीष देता था। तीनों राष्ट्र मिलकर परमेश्वर की संतान कहलाए। संसार के लोग देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि कैसे शत्रु राष्ट्र एक होकर परमेश्वर की महिमा गाने लगे।
और इस प्रकार यशायाह भविष्यद्वक्ता के मुख से निकली यहोवा की वाणी पूरी हुई: "धन्य है मिस्र मेरी प्रजा, और अश्शूर मेरे हाथों का काम, और इस्राएल मेरी मीरास।"
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