**यिर्मयाह 10: एक मूर्तियों की निरर्थकता और परमेश्वर की महिमा**
उन दिनों में, जब यहूदा के लोगों का हृदय परमेश्वर से भटक चुका था, यिर्मयाह नबी को प्रभु का वचन मिला। यरूशलेम की गलियाँ मूर्तियों के निर्माण और पूजा से गूँज रही थीं। लोग काष्ठ और चाँदी से बने देवताओं के सामने नतमस्तक होते, उनसे आशीषें माँगते, मानो वे उन्हें बचा सकते थे।
एक दिन, यिर्मयाह ने यरूशलेम के बाजार में प्रवेश किया। वहाँ एक कारीगर लकड़ी को छेनी से तराश रहा था। उसके पास सोने का पत्तर पड़ा था, जिसे वह उस मूर्ति पर चढ़ाने वाला था। लोग उसके चारों ओर इकट्ठा थे, उसकी कला की प्रशंसा करते हुए। यिर्मयाह ने उनकी ओर देखा और उदास होकर कहा,
**"हे यहूदा के लोगो, सुनो! ये मूर्तियाँ जिन्हें तुम देवता मानते हो, क्या हैं? ये केवल काठ के टुकड़े हैं, जिन्हें मनुष्य के हाथों ने गढ़ा है। कारीगर ने इन्हें बनाया, सुनार ने सोने से सजाया, पर क्या ये बोल सकती हैं? क्या ये चल सकती हैं? नहीं! इनके लिए कुल्हाड़ी और हथौड़ा चलाने वाले हाथ ही इनका आधार हैं।"**
लोगों ने उसकी ओर घूरकर देखा। कोई क्रोधित हो उठा, कोई हँसने लगा। एक व्यक्ति बोला, **"यिर्मयाह, तुम हमेशा डराने की बातें करते हो! ये देवता हमारे पूर्वजों के समय से हमारी रक्षा करते आए हैं!"**
यिर्मयाह ने गहरी साँस ली और आकाश की ओर देखकर कहा, **"सच्चा परमेश्वर वह है जिसने आकाश और पृथ्वी को बनाया। उसकी शक्ति के सामने सारी मूर्तियाँ धूल के समान हैं। जब वह गरजता है, आकाश काँप उठता है। जब वह बादलों को छूता है, वे बरसने लगते हैं। उसकी बुद्धि अथाह है, उसकी समझ अगम्य। मनुष्य की बनाई मूर्तियाँ उसके सामने क्या हैं? वे न तो अच्छा कर सकती हैं, न बुरा। वे न तुम्हें बचा सकती हैं, न तुम्हारी प्रार्थनाएँ सुन सकती हैं!"**
तभी एक तेज आँधी चली। आकाश में बादल घिर आए और बिजली चमक उठी। लोग डरकर इधर-उधर भागने लगे। मूर्ति बनाने वाला कारीगर अपने औजार छोड़कर छिप गया। यिर्मयाह ने ऊँची आवाज में कहा, **"देखो! सच्चा परमेश्वर अपनी शक्ति प्रकट कर रहा है। क्या तुम्हारी मूर्तियाँ इस आँधी को रोक सकती हैं? क्या वे तुम्हें इस ओले से बचा सकती हैं?"**
लोगों का अहंकार टूटने लगा। कुछ ने अपने माथे ढक लिए, कुछ रोने लगे। यिर्मयाह ने उनसे कहा, **"हे याकूब के वंशजो, सीधे मार्ग पर लौट आओ। परमेश्वर तुम्हें भूला नहीं है। वह तुम्हें अनंत प्रेम से पुकारता है। उसकी व्यवस्था को मानो, उसके वचन को ग्रहण करो, तभी तुम्हारी आत्माएँ शांति पाएँगी।"**
धीरे-धीरे आँधी शांत हुई। लोगों के हृदयों में एक नई जागृति आई। कुछ ने अपनी मूर्तियाँ तोड़ डालीं, कुछ ने मंदिर की ओर कदम बढ़ाए। यिर्मयाह ने प्रार्थना की, **"हे प्रभु, तू ही सच्चा राजा है। तेरी महिमा सदा बनी रहे।"**
और इस प्रकार, यिर्मयाह के वचन ने लोगों को याद दिलाया कि असली शक्ति मनुष्य के हाथों की बनाई वस्तुओं में नहीं, बल्कि सृष्टिकर्ता परमेश्वर में है, जो सदा जीवित और सर्वशक्तिमान है।
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