पाप का बोझ और पश्चाताप

यरूशलेम की गर्मियों की वह दोपहर बेहद स्तब्ध थी। हवा तक जैसे थम गई थी, और सूरज शहर की सफेद...

पाप का बोझ और पश्चाताप

यरूशलेम की गर्मियों की वह दोपहर बेहद स्तब्ध थी। हवा तक जैसे थम गई थी, और सूरज शहर की सफेद पत्थर की दीवारों पर ऐसे पड़ रहा था मानो उन्हें गलाने का निश्चय किया हो। एलियाब अपनी छोटी सी कुटिया के अंधेरे कोने में बैठा था, लेकिन उसका मन उस शरीर से कहीं ज्यादा भारी था। वह भार एक रहस्य था, एक ऐसा रहस्य जो उसके अपने हृदय में दबा था और जिसने उसकी नींद चुरा ली थी।

कई हफ्ते हो गए थे। एक झूठ, फिर उस झूठ को छुपाने के लिए दूसरा झूठ, और फिर एक गलतफहमी जो उसने सुधारने की कोशिश तक नहीं की। यह सब इतना छोटा सा, इतना सामान्य सा लगता था शुरू में। लेकिन अब वह सब उसके भीतर एक पहाड़ बन गया था। वह भोजन के स्वाद से, दोस्तों की बातचीत से, यहाँ तक कि सुबह की प्रार्थना से भी कट सा गया था। उसका शरीर सूख रहा था, जैसे गर्मी की इस लू में उसकी जड़ें मुरझा गई हों। रातें सबसे बुरी होती थीं। चुप्पी में उसे अपनी सांसों की आवाज सुनाई देती, और हर सांस के साथ वह रहस्य और उसके परिणामों का बोझ उठाता। उसकी हड्डियाँ पुराने हो चुके व्यक्ति जैसी चरमरा रही थीं, और उसकी ताकत गर्मी के सूखे तालाब की तरह सिमटती जा रही थी।

एक दिन, जब वह शहर के बाहरी इलाके में जैतून के पेड़ों के बीच से गुजर रहा था, तभी अचानक एक तेज आंधी उठी। बादल घिर आए, और ठंडी हवा के झोंकों ने धूल के बवंडर खड़े कर दिए। एलियाब एक पुराने जैतून के पेड़ के नीचे छिप गया। बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें जमीन पर गिरने लगीं, और उसकी गंध ने हवा को भर दिया। तभी उसने देखा कि सामने की पहाड़ी से पानी की एक धारा बह निकली है। कुछ ही पलों में वह धारा एक उफनती नाली बन गई, जो सारी गंदगी, सूखी पत्तियाँ और टहनियाँ बहा ले जा रही थी। पानी इतना स्वच्छ और तेज था।

उसी क्षण, यह दृश्य देखकर, एलियाब के भीतर कुछ टूट गया। वह पेड़ के नीचे ही घुटनों के बल बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन ये आँसू केवल डर या थकान के नहीं थे। ये एक गहरी, दबी हुई पीड़ा से निकले थे। उसने अपना माथा जमीन से लगा दिया और जो शब्द उसके हृदय में दबे पड़े थे, वे अंततः उसके होठों पर आ गए।

"हे परमपिता," उसकी आवाज़ काँप रही थी, "मैंने पाप किया है। मैंने गलत किया है। मैंने छुपाया है, मैंने झूठ बोला है। मेरा अंतर्मन इस बोझ से दबा जा रहा है।"

वह बोलता गया। हर वह बात, हर वह छोटी सी गलतियाँ भी, जिसे उसने तुच्छ समझकर अनदेखा कर दिया था, सब कुछ उसने उस प्रभु के सामने रख दिया, जिसकी उपस्थिति उसे उस तूफान और उस पहाड़ी की धारा में महसूस हो रही थी। वह रोया, वह काँपा, लेकिन जैसे-जैसे वह बोलता गया, एक अजीब सी घटना घटने लगी। उसके सीने का वह पत्थर जैसे पिघलने लगा। वह भारीपन, जो उसकी हड्डियों तक में समा गया था, धुलने लगा। यह ऐसा था जैसे उस नाली का पानी उसके भीतर भी बहने लगा हो, उसकी अंतरात्मा की सारी मैल को बहा ले जा रहा हो।

थोड़ी देर बाद जब बारिश रुकी और सूरज फिर से निकला, तो एलियाब उठ खड़ा हुआ। उसका शरीर अब भी कमजोर था, लेकिन उसकी आत्मा हल्की थी। उसे लगा जैसे वह सालों बाद गहरी सांस ले पा रहा हो। वह जानता था कि उसके कर्मों का दंड अभी बाकी हो सकता है, लेकिन उस डर ने उसका गला नहीं दबाया। क्योंकि जो डर उस रहस्य को छुपाने का था, वह तो जाता रहा था। उसकी जगह एक विशाल, शांत विश्वास ने ले ली थी – कि उसने जिसके सामने स्वीकार किया था, वह उसे क्षमा करने में सक्षम है।

अगले दिनों में, एलियाब ने जो कुछ बिगाड़ा था, उसे सुधारने का काम शुरू किया। यह आसान नहीं था। उसे लोगों के सामने अपनी गलती माननी पड़ी, क्षमा माँगनी पड़ी, नुकसान की भरपाई करनी पड़ी। हर कदम पर शर्म और संकोच था, लेकिन अब उसके पास एक नई ताकत थी – निर्भय होकर सच को स्वीकार करने की ताकत। वह समझ गया था कि सच्ची पीड़ा पाप के परिणामों में नहीं, बल्कि उसे अपने भीतर दबाए रखने में है। जब तक वह उसे छुपाता रहा, परमेश्वर का हाथ उस पर भारी बना रहा। लेकिन जैसे ही उसने उसे स्वीकार कर लिया, वह भार उठा लिया गया।

एक शाम, जब वह अपने दरवाजे पर बैठा हुआ था और पहाड़ियों पर सूरज डूब रहा था, तो उसके मन में एक नया गीत उमड़ आया। वह दाऊद के उन शब्दों को, जो उसने कभी समझे नहीं थे, अब अपने अनुभव से समझ रहा था – "धन्य है वह जिसका अपराध क्षमा हुआ, जिसका पाप ढक दिया गया। धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म का लेखा-जोखा यहोवा ने नहीं लगाया।" यह आशीष छिपने या बच निकलने में नहीं थी। यह आशीष थी उस सच्चाई में खड़े होने में, जहाँ दया और अनुग्रह का प्रवाह उस नाली के पानी की तरह तेज और स्वच्छ बह सकता था, और सब कुछ शुद्ध कर सकता था।

एलियाब ने अपनी आँखें बंद कर लीं। गर्मी की वह तपन अब लगती नहीं थी। उसे लगा जैसे उसके चारों ओर एक ठंडी, मृदु हवा का घेरा है – एक सुरक्षा, एक आश्वासन। वह जानता था कि अब से जीवन की राह पर, चाहे कितनी भी ऊबड़-खाबड़ क्यों न हो, वह अकेला नहीं चलेगा। जिसने उसकी पुकार सुनी थी, वही अब उसका मार्गदर्शक होगा। और यही ज्ञान, यही विश्वास, किसी भी समृद्धि से बड़ा धन था।

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