धूप इतनी तेज थी कि हवा भी थककर पहाड़ों के पीछे सो गई लगती थी। एलियाकिम की पीठ पर पसीने की धार बह रही थी, पर उसका हाथ जो जमीन पर था, वह कोमल था। उसकी उँगलियाँ उस गेहूँ की बाली के चारों ओर फिसलीं, जो बाकियों से ज़रा ज़्यादा ही सुनहरी, ज़रा ज़रा ज़्यादा ही भारी लग रही थी। यह पहली बाली थी, पहला फल, उसकी छोटी सी जोत से निकली हुई संपदा की पहली किरण। उसने उसे तनिक भी न तोड़ा, बस ऐसे पकड़े रहा, मानो कोई नवजात शिशु हो।
उसकी नज़रें दूर, पहाड़ों के उस पार खो गईं, जहाँ से उसके पितामह आए थे। "मेरे पूर्वज भटकता हुआ अरामी था," उसके होठ फड़फड़ाए, बिना आवाज़ के। वह वाक्य, वह स्वीकारोक्ति, जो उसके दादा ने सुनाई थी और उसके पिता ने दोहराई थी, अब उसकी अपनी स्मृति का हिस्सा बन चुकी थी। वह भटकना, वह दासत्व, और फिर वह विमोचन – यह सब उस गेहूँ की इस एक बाली में समा गया लगता था। यह केवल अनाज नहीं था; यह इतिहास था, एक वाचा का साक्ष्य था।
उसने बाली को एक साफ, सफेद लिनन के कपड़े में सावधानी से लपेटा। अगले दिन, भोर के धुंधलके में ही, वह अपने परिवार के साथ शिलो की ओर चल पड़ा। टोकरी उसके हाथ में थी, और उसके भीतर एक अजीब-सी गुदगुदी। रास्ते लंबे थे, पथरीले। दोपहर तक वह पवित्र निवास के सामने खड़ा था। भीड़ थी, सबके हाथों में समान टोकरियाँ – किसी के पास अंजीर और अनार थे, किसी के पास जैतून का तेल, किसी के पास दाखमधु। सबके चेहरे पर एक शांत, गहन उल्लास था।
एलियाकिम ने टोकरी को याजक के हाथों में सौंपी। याजक ने उसे वेदी के सामने रख दिया। फिर एलियाकिम ने अपना सिर झुकाया, और उसके मुँह से वे शब्द फूट पड़े, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे थे, पर आज उसमें एक नया, ताज़ा जीवन भर आया था।
"मेरे पूर्वज भटकता हुआ अरामी था," उसने कहना शुरू किया, आवाज़ थोड़ी काँप रही थी। "वह थोड़े से लोगों के साथ मिस्र गया, और वहाँ एक बड़ी जाति, शक्तिशाली और बहुसंख्यक बन गया। पर मिस्रियों ने हमसे बुरा व्यवहार किया, हमें दुःख दिया, और हम पर कठोर दासत्व लाद दिया। तब हमने अपने पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा की दोहाई दी... और यहोवा ने हमारा रोना सुना, हमारी पीड़ा देखी... और हमें बड़ी सामर्थ्य और भययोग्य कर्मों के द्वारा मिस्र से निकाल लाया। और उसने हमें इस देश में ले आया, यह देश जो दूध और मधु की धारा बहाता है। और अब देख, मैं यह भूमि का पहला फल लाया हूँ, जो तूने, हे यहोवा, मुझे दी है।"
वह शब्द हवा में लटक गए। उसने अपनी टोकरी वहीं छोड़ दी, एक समर्पण, एक धन्यवाद। फिर वह मुड़ा, और भीड़ में खो गया। लेकिन अनुष्ठान यहीं समाप्त नहीं हुआ। घर लौटकर, तीसरे वर्ष के दशमांश को अलग करने का समय था। एलियाकिम ने अपने भंडार से अनाज, तेल और दाखमधु निकाला। यह वह हिस्सा था जो लेवी के, परदेशी के, अनाथ के, और विधवा के लिए था। उसने अपने बेटे से कहा, "इसे गाँव के चौराहे पर ले चलो। जाओ, उन सबके साथ बाँट दो जिनके पास अपनी कोई जोत नहीं है।"
उसका बेटा, एक जिज्ञासु युवा, पूछ बैठा, "पिताजी, हम इतना क्यों देते हैं? हमने तो मेहनत की है।"
एलियाकिम ने उसके कंधे पर हाथ रखा, और खेतों की ओर इशारा किया, जो अब सुनहरे सागर की तरह लहरा रहे थे। "क्योंकि हम कभी गुलाम थे, बेटा। और क्योंकि यह भूमि वास्तव में हमारी नहीं है। यह उसकी है, जिसने हमें छुड़ाया। यह सब कुछ देने का नहीं, याद रखने का नियम है। जब तक हम देते रहेंगे, तब तक हम नहीं भूलेंगे कि हम कौन हैं, और कहाँ से आए हैं।"
उस शाम, जब अलाव जल रहा था और गाँव के लेवी, परदेशी और विधवाएँ सबके साथ बैठकर भोजन कर रहे थे, एलियाकिम ने आकाश की ओर देखा। तारे टिमटिमा रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे मिस्र की रातों में हुआ करते थे। पर आज की रात अलग थी। यह स्वतंत्रता की रात थी, कृतज्ञता की रात थी। और उस टोकरी में, जो अब शिलो में यहोवा के सामने रखी हुई थी, केवल गेहूँ के दाने ही नहीं थे। उसमें एक यात्रा का सार समाया हुआ था – भटकन से विश्राम तक, विलाप से विजय तक, एक वादे से उसकी पूर्ति तक की यात्रा। और एलियाकिम जानता था कि जब अगले साल फिर बीज बोया जाएगा, तो यह चक्र, यह स्मरण का पवित्र नृत्य, फिर से शुरू हो जाएगा।
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