गलातियों 5 नया नियम

आत्मा की अगुवाई में आज़ादी

मोहन अपनी झोपड़ी की देहरी पर बैठा, सूरज ढलने का इंतज़ार कर रहा था। दिनभर की गर्मी की मार से...

गलातियों 5 - आत्मा की अगुवाई में आज़ादी

मोहन अपनी झोपड़ी की देहरी पर बैठा, सूरज ढलने का इंतज़ार कर रहा था। दिनभर की गर्मी की मार से पूरा गाँव थक गया था, और उसका अपना मन भी एक अजीब सी जकड़न से भरा हुआ था। वह आज़ाद होकर भी आज़ाद नहीं था, यह भावना उसे खाए जा रही थी। शहर से लौटे उसके भाई ने कहा था – "तुम नियमों में जकड़े हुए हो, मोहन। धर्म के नाम पर डरते हो, कर्तव्य के नाम पर अपने मन को मारते हो। असली आज़ादी तो हम शहर वालों को है।"

यह बात उसके मन में कंटक की तरह चुभ गयी थी। क्या सचमुच? वह जिस इमारत को अपना जीवन समझता था, क्या वह सिर्फ एक पिंजरा था? उसने अपने हाथ देखे – मिट्टी में सने, मेहनत से बदरंग हुए। यही हाथ सुबह-सुबह पूजा के लिए फूल चुनते, देवी-देवताओं को अर्पण करते, और फिर दिन भर ऐसे ही काम करते, कभी गुस्से से मुट्ठी बंद हो जाते, कभी लालच से किसी की जमीन की तरफ लपकते, कभी ईर्ष्या से अपने पड़ोसी की नई बैलगाड़ी को देखते। उसके भीतर एक युद्ध चल रहा था, और वह हार रहा था।

उसी शाम, वह अपनी उलझन लेकर गाँव के बाहर, नदी किनारे बैठे बुजुर्ग इलियास के पास पहुँचा। इलियास उम्र से भी ज्यादा समझदार लगते थे, उनकी आँखों में एक ऐसी शांति थी जो मोहन को अपनी तरफ खींचती थी। मोहन ने सारी बात कह सुनाई – अपने भाई की बात, अपने मन का संघर्ष, वह डर, वह बंधन।

इलियास नदी की धारा को देखते रहे, फिर धीरे से बोले, "मोहन, तेरा भाई आधा सच कहता है। वह शरीर की आज़ादी की बात करता है, जो दासी से भी बदतर है। देख, जब तू अपने मन के उन राक्षसों के आगे घुटने टेक देता है – गुस्से के आगे, वासना के आगे, फूट डालने वाली बातों के आगे – तो तू एक गुलाम है। यही वे काम हैं जो मनुष्य को मनुष्य से काट देते हैं। तेरे भाई की आज़ादी शायद यही है – जो चाहे करने की आज़ादी। पर यह आज़ादी नहीं, बिछुड़ने का रास्ता है।"

मोहन सुनता रहा। इलियास ने एक छोटी सी लकड़ी उठाई और रेत पर कुछ लकीरें खींचने लगे। "सच्ची आज़ादी," वह बोले, "वह है जब तू एक मार्गदर्शक को पकड़ ले। जैसे यह नदी, किनारों के बीच से बहती है तो ही ताकतवर है, स्वच्छ है। उफन कर किनारे तोड़ दे तो विनाश लाती है। वह मार्गदर्शक परमात्मा का आत्मा है। अगर तू उसके नेतृत्व में चले, तो फिर तुझे उन नियमों की ज़रूरत नहीं जो तुझे डराते हैं। क्योंकि तेरा मन ही बदल जाएगा।"

"लेकिन यह आत्मा... यह कैसे काम करती है?" मोहन ने पूछा, उसकी आवाज़ में जिज्ञासा थी।

"इसे समझना कोई सिद्धांत नहीं है, अनुभव है," इलियास मुस्कुराए। "जब तू उस आत्मा के साथ चलने लगेगा, तो तेरे जीवन से वे जंगली बेलें स्वतः मुरझाने लगेंगी। गुस्सा, झगड़ा, फूट, ईर्ष्या, अहंकार... ये सब। और उनकी जगह नई फसल उग आएगी। प्रेम की – जो सहने की ताकत दे। आनंद की – जो हर हाल में मुस्कुराती रहे। शांति की – जो तूफान में भी डगमगाए नहीं। धैर्य की – जो समय का इंतज़ार कर सके। मिठास की – जो कड़वाहट को मीठा कर दे। भलाई की – जो हर पल अच्छा सोचे। विश्वास की – जो अदृश्य को थाम ले। नम्रता की – जो अपने को बहुत बड़ा न समझे। और संयम की – जो अपने आप पर लगाम रख सके।"

इलियास ने लकड़ी रख दी। "इनके लिए कोई कानून नहीं है, मोहन। यह आत्मा का फल है। जैसे एक अच्छा पेड़ स्वयं ही मीठे फल देता है। तुझे बस उस आत्मा के प्रवाह में अपने आप को खोलना है। और उस आत्मा की अगुवाई में चलने वाला, वास्तव में आज़ाद है। वह उन सब बेड़ियों से आज़ाद है जो उसके भीतर के राक्षसों ने पहना रखी हैं।"

उस दिन के बाद, मोहन का जीवन धीरे-धीरे बदलने लगा। यह कोई एक रात का चमत्कार नहीं था। कई दिन तो वह पुराने ढर्रे पर लौट आता। लेकिन अब उसके पास एक दिशा थी। जब कभी गुस्सा उबलने लगता, वह रुकता, एक गहरी साँस लेता, और उस शांति को याद करता जिसकी बात इलियास ने की थी। जब कभी पड़ोसी रामलाल की तरक्की देखकर मन कसैला होता, वह जानबूझकर उसकी मदद करने चला जाता। पहले यह बनावटी लगता, लेकिन धीरे-धीरे यही उसकी आदत बन गयी।

एक बार की बात है, गाँव में पानी को लेकर झगड़ा हो गया। दो दल आमने-सामने खड़े थे, लाठियाँ और गुस्सा तैयार था। मोहन का अपना भी पक्ष था, उसका खेत भी प्यासा था। पुराना मोहन होता तो आगे खड़ा होकर लड़ता। लेकिन उस दिन, वह बीच में खड़ा हो गया। उसकी आवाज़ में वह गुस्सा नहीं था जो भीड़ को और भड़काता। वह बोला, "अगर आज हम एक-दूसरे का खून बहाएँगे, तो कल यह पानी किस काम का? क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को यही विरासत देंगे?"

उसकी बात में जादू नहीं था, लेकिन धैर्य था। वह शांति की एक दीवार-सा खड़ा हो गया। देखते-ही-देखते तनाव ढीला पड़ने लगा। बातचीत शुरू हुई। समझौता हुआ। उस रात, मोहन को लगा जैसे उसने अपने भीतर के एक बड़े राक्षस को हरा दिया है। यह जीत लाठी से नहीं, उस आत्मा की ताकत से हुई थी जो अब उसमें बस रही थी।

उसकी आज़ादी अब उसके भाई वाली आज़ादी नहीं थी। यह भीतर से आई हुई स्वतंत्रता थी – उन सब चीजों से मुक्ति जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थीं। और इस आज़ादी में, उसे सच्चा सुख मिला। वह पहले से कहीं ज्यादा... जीवित था।

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