रात की गोपनीय शिक्षा: निकुदेमुस और यीशु

यरूशलेम की रातें एक अजीब सी सन्नाटे से भरी होती थीं। दिन भर की धूप की गर्मी पत्थरों से...

रात की गोपनीय शिक्षा: निकुदेमुस और यीशु

यरूशलेम की रातें एक अजीब सी सन्नाटे से भरी होती थीं। दिन भर की धूप की गर्मी पत्थरों से टकराती हुई धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी। निकुदेमुस अपने कमरे में बैठा, उसके हाथ में एक खुली हुई धर्म-पुस्तक थी, लेकिन उसकी आँखें शब्दों पर टिकी नहीं थीं। बाहर, चंद्रमा की रोशनी में शहर की सफेद दीवारें भूतिया सी दिख रही थीं। उसके मन में वह व्यक्ति घूम रहा था – यीशु। गलील का वह करिश्माई रब्बी, जिसके चारों ओर चमत्कारों की बातें और विवाद दोनों ही चक्कर काट रहे थे।

उसने कपड़े बदले – सादे, गहरे रंग के, जो उसकी फ़रीसी और सान्हेद्रिन के सदस्य की हैसियत को छुपा सकें। एक लंबा, हल्का चोगा पहना, और धीरे से दरवाज़ा खोलकर गली में उतर गया। हवा में जैतून के पेड़ों की सरसराहट थी। पैरों के नीचे बजरी कभी-कभी चरमरा उठती। वह जानता था कि यह मुलाकात गोपनीय रहनी चाहिए। उसकी प्रतिष्ठा, उसकी स्थिति… सब दाँव पर लगा था।

यीशु शायद शहर के बाहरी हिस्से में, किसी मित्र के आँगन में ठहरे हुए थे। निकुदेमुस ने उस जगह का पता लगाया था। दरवाज़ा खुला था। भीतर, तेल के एक दीपक की मंद लौ टिमटिमा रही थी, और उसकी रोशनी में यीशु बैठे हुए थे, जैसे वह किसी का इंतज़ार कर रहे हों। निकुदेमुस के कदमों की आहट सुनकर उन्होंने सिर उठाया। उनकी आँखों में थकान थी, लेकिन एक गहरी शांति भी, जैसे कोई झील जिसकी सतह नीचे अनंत गहराइयों को छुपाए हुए है।

"रब्बी," निकुदेमुस ने आवाज़ में एक अजीब सी लड़खड़ाहट के साथ कहा, "हम जानते हैं कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु बनकर आया है, क्योंकि जो चिन्ह तू दिखाता है, उन्हें कोई दिखा नहीं सकता, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो।"

यीशु ने उसे देखा। वह देख रहे थे सिर्फ एक फ़रीसी को नहीं, बल्कि एक ऐसे मनुष्य को जिसकी प्यास उसके सभी धार्मिक ज्ञान के बावजूद अनबुझी थी। उनकी आवाज़ नरम, लेकिन स्पष्ट थी, जो रात की शांति को चीरती हुई सीधे निकुदेमुस के हृदय तक पहुँची।

"मैं तुझसे सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे, तो वह परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।"

निकुदेमुस स्तब्ध रह गया। नया जन्म? उसकी समझ में यह बात नहीं आई। उसकी उम्र, उसकी सीख, उसकी रीति-रिवाजों में डूबी हुई ज़िंदगी… यह सब एक झटके में बेमानी कैसे हो सकता है? उसने कहा, भावनाओं से भरी हुई आवाज़ में, "कोई बूढ़ा मनुष्य कैसे जन्म ले सकता है? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश कर सकता है?"

यीशु ने धीरे से सिर हिलाया। दीपक की लौ ने उनके चेहरे पर छाया और रोशनी का एक नज़ारा बनाया। "मैं तुझसे सच कहता हूँ, यदि कोई जल और आत्मा से न जन्मे, तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है। अचम्भा न कर कि मैंने तुझसे कहा, 'तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना होगा।' हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती और किधर जाती है। जो कोई आत्मा से जन्मा है, वह ऐसा ही है।"

निकुदेमुस चुप बैठा रहा। बाहर, रात की हवा एक पल के लिए रुकी और फिर जैतून के पत्तों के बीच से एक सरसराहट की आवाज़ लेकर गुज़री। हवा… जिसे देखा नहीं जा सकता, लेकिन उसके प्रभाव को महसूस किया जा सकता है। क्या आत्मा का जन्म भी ऐसा ही है? उसकी समझ का घेरा टूट रहा था।

"यह कैसे हो सकता है?" उसने अंततः पूछा, आवाज़ में अब विवाद नहीं, बल्कि एक गहरी जिज्ञासा थी।

यीशु ने उसे एक कोमल तिरस्कार के साथ देखा। "तू इस्राएल का गुरु होकर भी क्या इन बातों को नहीं समझता?" फिर उन्होंने आगे समझाया, धीरे-धीरे, जैसे कोई बीज बो रहे हों। "हम जिसे जानते हैं, उसी की चर्चा करते हैं, और जिसे हमने देखा है, उसी की गवाही देते हैं, परन्तु तुम हमारी गवाही ग्रहण नहीं करते। मैंने तुमसे पृथ्वी की बातें कहीं और तुम प्रतीति नहीं करते; यदि मैं स्वर्ग की बातें कहूँ, तो फिर कैसे प्रतीति करोगे? और कोई स्वर्ग पर नहीं चढ़ा, केवल वही जो स्वर्ग से उतरा, अर्थात मनुष्य का पुत्र जो स्वर्ग में है।"

फिर यीशु ने एक उदाहरण दिया, जो निकुदेमुस के लिए परिचित था, लेकिन अब एक नए, गहन अर्थ के साथ। "और जैसे मूसा ने जंगल में साँप को ऊँचे पर चढ़ाया, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी ऊँचे पर चढ़ाया जाना अवश्य है, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह अनंत जीवन पाए।"

निकुदेमुस ने अपनी सांस रोक ली। उस साँप की कहानी वह जानता था – लोगों के पाप के कारण उन पर विषैले साँपों का हमला हुआ, और मूसा ने परमेश्वर के आदेश पर एक पीतल का साँप बनाकर एक डंडे पर चढ़ा दिया। जिसने भी उस पीतल के साँप की ओर देखा, वह बच गया। यह एक चिन्ह था। और अब यीशु स्वयं को उसी तरह ऊँचे पर चढ़ाया जाने वाला बता रहे थे… इसका क्या अर्थ हो सकता है?

और तभी, यीशु ने वे शब्द कहे, जो रात की हवा में स्थिर होकर लटक गए, जैसे सृष्टि का सार तत्व। "क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनंत जीवन पाए। क्योंकि परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दंड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए। जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती; परन्तु जो विश्वास नहीं करता, वह दंड की आज्ञा हो चुका है, क्योंकि उसने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया।"

निकुदेमुस की आँखों के सामने एक दृश्य उभरा – अनंत प्रेम, इतना विशाल कि वह समझ से बाहर था, अपने पुत्र को देने का कार्य, ताकि कोई भी, चाहे वह कितना भी दूर क्यों न हो, बस देखकर, विश्वास करके, जीवन पा सके। यह धर्मशास्त्र नहीं था। यह एक प्रेम-कहानी थी, जिसका केंद्र स्वयं परमेश्वर था।

यीशु ने आगे कहा, उनकी आवाज़ में एक दुखभरा तत्व था, "और दंड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना, क्योंकि उनके काम बुरे थे। क्योंकि जो कोई बुराई करता है, वह ज्योति से बैर रखता है, और ज्योति के निकट नहीं आता, कहीं ऐसा न हो कि उसके कामों पर दोष लगाया जाए। परन्तु जो सत्य के अनुसार करता है, वह ज्योति के निकट आता है, ताकि उसके काम प्रकट हों, कि वह परमेश्वर में किए गए हैं।"

निकुदेमुस बहुत देर तक चुप बैठा रहा। दीपक का तेल अब खत्म होने को था, और लौ और भी कमजोर हो गई थी। उसे लगा जैसे वह अपने जीवन की सबसे गहरी बातचीत के बीच में बैठा है। वह सब कुछ जो उसने जाना था – व्यवस्था, रीति-रिवाज, पवित्रता के नियम – वह सब अचानक एक बड़े, जीवित सत्य के सामने पृष्ठभूमि में धुंधला सा हो गया। वह स्वयं को एक ऐसे रास्ते पर खड़ा पा रहा था, जहाँ एक ओर वह सब था जो उसने बनाया था, और दूसरी ओर एक नया, रहस्यमय जन्म था।

जब वह उठा, तो रात पहले से भी गहरी हो चुकी थी। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। उसने यीशु को विदा किया, बिना कुछ कहे। लौटते हुए, उसके कदम भारी थे, लेकिन मन में एक अजीब सी हल्काप

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