वह दिन ऐसा था जैसे आकाश ने सिसकियाँ भर रखी हों। हवा में धूल के बवंडर नहीं, एक स्थिर उदासी थी, जैसे सारी सृष्टि किसी बड़े दुख की प्रतीक्षा में साँस रोके बैठी हो। मैं, यशायाह, अपनी कुटिया के सामने बैठा था, और मेरे हृदय पर प्रभु का हाथ एक अजीब-सी भारी गर्मी लिए दब रहा था। यह कोई साधारण दर्श नहीं था; यह तो ऐसा था जैसे कोई चाकू हृदय को चीरकर भविष्य की एक तस्वीर उसमें रख दे।
और मैंने देखा।
एक व्यक्ति था। पर उसे देखकर 'व्यक्ति' शब्द मन में नहीं आता था। वह मनुष्यों के बीच एक नई जड़ से उगा हुआ कोई कोमल अंकुर था, परन्तु उसकी जड़ें सूखी मिट्टी में थीं। उसके रूप में ऐसा कुछ नहीं था जो आँखें पकड़े। न तेज, न चमक, न वह शानदार ठाठ जिससे लोग आकर्षित होते हैं। उलटे, उसका चेहरा शोक से इतना धुला हुआ था, इतना म्लान, कि लोग स्वयं उससे मुँह मोड़ लेते। वह तिरस्कार का पात्र था, दुखों का भोक्ता, और रोगों से ऐसा घिरा हुआ कि देखने वाला सोचता, 'यह तो ईश्वर की मार हुई है।'
मेरी आत्मा काँप उठी। मैं प्रभु से पूछना चाहता था, 'यह कौन है? यह दृश्य क्यों?' पर मेरे शब्द गले में अटक गए। दृश्य और स्पष्ट होता गया।
वह चुपचाप सह रहा था। उस पर अत्याचार हो रहे थे, वह पीड़ा झेल रहा था, पर उसका मुँह बंद था। जिस प्रकार भेड़ वधस्थल की ओर चलती है और मेम्ना ऊन कतरने वालों के सामने मूक रहता है, ठीक वैसे ही उसने अपना मुँह नहीं खोला। एक गहरा, भयानक विरोधाभास था—वह दुख उठा रहा था, पर वह दुख उसका अपना नहीं लगता था। वह तो हमारे अपराधों, हमारे अधर्म के कारण पिस रहा था। उसकी पीठ पर जो कोड़े पड़ रहे थे, वे हमारे पापों के कारण थे। उसके शरीर पर जो घाव थे, वे हमारी चंगाई के लिए थे।
मैंने अपने ही लोगों को देखा—उसके अपने ही लोग—उसका तिरस्कार करते, उससे घृणा करते। वे उसे ठुकरा रहे थे। और वह सब सह रहा था। क्यों? यह प्रश्न मेरे मस्तिष्क में गूँज रहा था। तब एक स्वर, गहरा और दुख से भरा, मेरे भीतर बोला, "सब हम भेड़ों की तरह भटक गए हैं, हम में से हर एक ने अपना-अपना मार्ग लिया। और प्रभु ने हम सभी के अधर्म का भार उसी पर डाल दिया।"
आह, क्या भयानक बात! वह सज़ा पा रहा था, ताकि हम शान्ति पा सकें। उस पर चोटें पड़ रही थीं, ताकि हम अच्छे हो सकें। वह बलिदान की वेदी पर चढ़ाया जा रहा था, और हम समझ रहे थे कि वह ईश्वर से मारा गया है। पर सच तो यह था कि वह टूटा हुआ अनाज था जिसे पीसकर हमारे लिए रोटी बनानी थी।
दृश्य बदला। उसे दफनाया जा रहा था। और वह भी कैसे? दुष्टों के संग एक समाधि में, धनवान की कब्र में। उसका जीवन अन्याय से भरा था, और अब मृत्यु भी अपमानजनक। मेरी आँखों में आँसू आ गए। इतनी निरर्थक, इतनी निष्फल मृत्यु? क्या यही अंत है?
पर नहीं। एक क्षण में, वह अँधेरा चीरता हुआ प्रकाश फैलने लगा। प्रभु की इच्छा उस पर पूरी हुई थी। वह दुख भोगकर संतुष्ट हो गया। उसने अपना जीवन दोषबलि स्वरूप अर्पित किया था। और अब... अब वह देखेगा। वह दीर्घजीवी होगा। प्रभु की इच्छा उसके हाथ से सफल होगी।
मेरी साँस रुक-सी गई। वह जो सबसे तुच्छ समझा गया, वही महान होगा। वह जो पापों का भार उठाकर गया, वही अनेकों को धर्मी ठहराएगा। क्योंकि उसने ही उनके अधर्म का भार वहन किया।
दर्शन धुँधलाने लगा। मैं अपनी कुटिया के सामने जमीन पर बैठा था, गालों पर आँसू सूख रहे थे। हवा का वह बोझिलपन अब नहीं था। सूरज की एक किरण बादलों को चीरकर आ रही थी। मैं समझ गया था। यह कोई साधारण भविष्यवाणी नहीं थी। यह एक वाचा थी। एक प्रेम की योजना, जो इतनी गहरी, इतनी दुखद, और इतनी महिमामयी थी कि मानव मन उसकी गहराई नाप नहीं सकता। मैंने उठकर अपनी लेखन की पटिया उठाई। इन शब्दों को खोना नहीं था। यह दृश्य, यह सत्य, संसार को जानना चाहिए। भले ही आज कोई न समझे, पर एक दिन, वह व्यक्ति आएगा। और तब सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।
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