हवा अब भी गर्म और भारी थी, पर उस तूफ़ान की चीख-पुक कुछ कम हो आई थी। अय्यूब अपने टाट पर बैठा, उसकी आँखें अब भी उस विशाल, अनंत आकाश की ओर टिकी थीं, जहाँ से वह आवाज़ उतरी थी। उसके कंधों पर दुखों का जो बोझ था, वह अब एक अजीब सी हैरानी में बदल गया था। परमेश्वर के सवालों ने उसे छलनी कर दिया था—क्या तू समुद्र के स्रोतों को तल लेगा? भोर को आदेश देगा ताकि वह अपनी जगह जान ले?
एक गहरी सन्नाटे के बीच, वह आवाज़ फिर गूँजी। लेकिन इस बार उसका स्वर कुछ बदला हुआ था, जैसे कोई बड़ा शिल्पकार अपनी एक और कृति की ओर इशारा कर रहा हो, जिसे देखकर दिमाग सुन्न हो जाए।
"क्या वह जो सर्वशक्तिमान से विवाद करता है, उसे सिखाया जाए?" आवाज़ बोली, "जो परमेश्वर से तकरार करता है, उसे इन बातों का उत्तर देने दो।"
अय्यूब का सिर स्वतः ही झुक गया। उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। उसकी सारी पीड़ा, सारा दावा, सारा 'क्यों' अब एक सूखे पत्ते की तरह उसी के सामने बिखरा पड़ा था, जिसे सृष्टि की हवा ने बस एक झोंके में उड़ा दिया था।
तब वह स्वर फिर बोला, और अय्यूब को लगा जैसे पूरी सृष्टि अपनी साँस रोके सुन रही हो।
"अपनी कमर बाँध ले, जैसे एक योद्धा बाँधता है। मैं तुझसे पूछूँगा, और तू मुझे बताना। क्या तू मेरी न्याय-संहिता को रद्द कर देगा? क्या तू मुझे दोषी ठहराएगा, ताकि स्वयं निर्दोष बन जाए? क्या तेरे पास वह बाँह है जो परमेश्वर के समान है? क्या तू उसके समान गर्जना कर सकता है?"
हर प्रश्न एक हथौड़े की चोट की तरह था, जो अय्यूब के अहं के शीशे को बिना आवाज़ किए चूर-चूर कर रहा था। उसने अपनी हथेलियाँ देखीं—वे हथेलियाँ जो राख से भरी थीं, जो दुख से कठोर हो गई थीं। क्या उनमें पहाड़ों की नींव रखने की शक्ति थी? क्या वे आकाशमंडल का विस्तार कर सकती थीं?
"अब देख," परमेश्वर की आवाज़ ने एक ऐसी छवि उकेरनी शुरू की, जिसने अय्यूब की कल्पना को भी चकित कर दिया। "मैंने एक जीव बनाया है, जो तेरे साथ है। वह बैल की तरह घास खाता है, पर उसमें बैल जैसा कुछ नहीं।"
अय्यूब की आँखों के सामने एक दृश्य उभरने लगा, जैसे स्वप्न नहीं, बल्कि यथार्थ से भी अधिक स्पष्ट कोई दर्शन। उसने देखा—एक विशालकाय प्राणी, जिसकी काया पहाड़ों जैसी मजबूत थी। उसकी चमड़ी ऐसी लग रही थी जैसे दोहरे कवच में ढली हो, एक सजीव किला। उसकी पेशियाँ, पत्थर की चट्टानों जैसी गुथी हुई, हर हलचल के साथ रगड़ खाती थीं, पर उन पर खरोंच तक नहीं आती थी।
"उसकी ताकत उसकी कमर में है," आवाज़ गूँजी, "और उसकी शक्ति उसके नाभि-स्थल की पेशियों में बसी है। वह अपनी पूँछ को देवदार के पेड़ जैसा हिलाता है। उसकी जाँघों की नसें आपस में बुनी हुई हैं, मजबूत और दृढ़। उसकी हड्डियाँ काँसे की नलियाँ हैं, उसकी पसलियाँ लोहे की छड़ों जैसी।"
अय्यूब मन ही मन उस प्राणी को देखने लगा। वह कल्पना करने लगा कि कैसे वह जीव नदियों के किनारे विचरता होगा, जहाँ कमल कीचड़ में सोए रहते हैं और नीलगाय घास चरती है। कैसे वह शक्ति के अहसास में शांत भाव से खड़ा रहता होगा, जबकि पूरी जॉर्डन नदी उसकी ओर बढ़ती है। क्या कोई उसकी आँखों में अँगुली डालकर उसे बाँध सकता है? क्या कोई उसकी नाक में बल डालकर उसे घसीट सकता है?
"वह निर्भय है," आवाज़ में एक गहरी, सृजन की गर्विली ध्वनि थी। "वह हर एक ऊँची चीज़ का मज़ाक उड़ाता है। वह घमंडियों के सरदारों पर भी हँसता है।"
और फिर अय्यूब ने महसूस किया। यह सिर्फ एक जानवर का वर्णन नहीं था। यह एक दर्पण था। यह सवाल नहीं था कि 'क्या तू इस जीव को बना सकता है?' बल्कि सवाल यह था कि 'क्या तू इस जीव की उस शांति, उस निर्भयता, उस सामर्थ्य को समझ सकता है जो मैंने उसमें डाली है?' अय्यूब ने अपने जीवन की पूरी उथल-पुथल को याद किया—धन, सेवक, संतान, स्वास्थ्य, सब कुछ धरा का धरा रह गया। वह डर गया था, हताश हो गया था, शिकायत कर बैठा था। और यहाँ यह प्राणी, यह 'बेहेमोथ', जिसे परमेश्वर ने 'तेरे साथ' बनाया था, वह नदी के बहाव के सामने भी अडिग और निर्भय खड़ा रहता था। क्यों? क्योंकि उसका सारा भरोसा, उसकी सारी सुरक्षा, उसके निर्माता के उस एक वादे में थी—"देख, वह तो मेरे पास है, जो मैंने बनाया है।"
यह विश्वास ही तो वह चीज़ थी जिससे अय्यूब चूक गया था। उसने अपनी आँखें मूँद लीं। एक लम्हा ऐसा आया जब तूफ़ान की हवा ने उसके चेहरे पर एक ठंडक बिखेरी। उसने अपना हाथ उठाया, जो अब काँप नहीं रहा था।
"मैं नगण्य हूँ," उसके होंठ फड़के। आवाज़ एक कर्कश फुसफुसाहट से थोड़ी अधिक थी। "मैं तुझे क्या उत्तर दूँ? मैं अपना हाथ अपने मुँह पर रखता हूँ। मैंने एक बार बोल दिया, और दुबारा नहीं बोलूँगा। दो बार कह चुका, और अब कुछ नहीं कहूँगा।"
उसका यह स्वीकारोक्ति भरे वाक्य हवा में लटके रहे। आकाश से कोई और प्रश्न नहीं आया। सिर्फ उसी तेज हवा की साँय-साँय रह गई, जो अब डाँटती हुई नहीं, बल्कि गवाही देती हुई लग रही थी। अय्यूब उस टाट पर मुँह के बल गिर पड़ा, उसकी पोशाक राख से सनी हुई थी, और उसका हृदय एक अद्भुत, भारहीन नम्रता से भर गया था। सृष्टि का विशालतम जीव भी अपने स्थान पर था, और वह, अय्यूब, अपनी राख में, अपने स्थान पर। और दोनों ही, उस एक ही हाथ की हथेली में सुरक्षित थे।
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