(यह कहानी अय्यूब के शब्दों में, उसकी स्मृतियों के आधार पर रची गई है।)
बात पुरानी है। बहुत पुरानी। उन दिनों में जब ईश्वर का दीया मेरे सिर पर जलता था। जब उनकी मित्रता मेरी झोंपड़ी पर छाई रहती थी। मैं अय्यूब था, और मेरा नाम ही मेरा परिचय था – धर्मी, न्यायी, ईश्वर-भक्त।
सर्दियों की वह शाम कितनी स्पष्ट है आँखों के सामने। सूरज ढलते ही ऊष के पत्थरों से एक सुनहरी ठंड उठने लगती। मेरे दरवाज़े के बाहर, चौराहे पर, वह बड़ा सा प्लाथ पत्थर गर्मी से दिनभर तपता और शाम को उस पर बैठने में एक अजीब सी शान्ति मिलती। मैं वहाँ बैठता। मेरी उम्र ऐसी थी जैसे पक्का हुआ जैतून का पेड़ – जड़ें गहरी, डालियाँ आशीर्वाद से लदी हुई। बुढ़ापा मेरे चेहरे पर बसन्त की मन्द हवा की तरह था, जो झुर्रियों में नहीं, बल्कि सम्मान की छायाओं में दिखता था।
और फिर वह दृश्य। मेरे नगर के बुजुर्ग, युवा, सबके सब मेरे पास आते। राजकुमार भी, जिनके हाथों में शासन की छड़ी होती, वे भी अपने रंग-बिरंगे वस्त्रों में चुपचाप जमीन पर बैठ जाते। उनके चेहरे पर एक अविश्वसनीय श्रद्धा होती। मुझे देखकर वे रुक जाते, फिर मेरे पास आकर खड़े हो जाते। बड़े-बूढ़े चुप रहते, अपना हाथ अपने मुँह पर रख लेते। आवाज़ गुम हो जाती। मेरी एक आह भी उनके लिए निर्देश बन जाती।
क्यों न होता? मैं अंधे की आँख बना करता था। लंगड़े के लिए पैर। मैं ही तो था जो गरीबों का बाप बना बैठा था। राह चलते किसी अनाट की सहायता करना, उसकी गुहार सुनना, जो कोई सहारा नहीं जानता था उसके लिए सहारा बन जाना – यह मेरा दैनिक धर्म था। बुराई के दाँत मैं तोड़ देता था, और उसके शिकार को मुक्ति के माँस के टुकड़े की तरह अपने जबड़ों से खींच लेता।
सोचता हूँ तो अब भी वे चेहरे याद आते हैं। जो विधवा मेरे दरवाज़े पर आकर रोती, उसकी आँखों में एक ऐसी चमक आ जाती जब मैं उसके लिए न्याय की व्यवस्था करता। मैं ऊनी वस्त्र ओढ़ता, सफेद मलमल का पहनावा पहनता। मेरे सिर पर न्याय की मुकुट-सी पगड़ी बँधी रहती। मैं चाँदी का सा चमकता हुआ, सोने की कलई वाला हाथी-दाँत सा दिखता। मेरी चाल में गरिमा थी, जैसे कोई पुराना, विशाल वृक्ष हवा में धीरे-धीरे डोल रहा हो।
जब भी मैं नगर में जाता, युवक मुझे देखकर छिप जाते। कोई भी सरदार मेरे सामने बोलने का साहस न करता। सब चुप रहते। मेरी बात सुनी जाती, मेरी सलाह को अन्तिम फैसला माना जाता। मैं बादलों पर बैठा हुआ वर्षा की तरह था, जो सूखी धरती को तृप्त कर दे। लोग मेरी प्रतीक्षा में रहते, जैसे देर से आने वाली वर्षा का इंतज़ार करते हैं।
उन दिनों मैं मुस्कुराता, और वह मुस्कुराहट उनके लिए प्रकाश बन जाती। मेरे चेहरे की रौनक किसी खोई हुई आशा को वापस ला देती। मैं उनके बीच राजा की तरह चलता, सेना में सेनापति की तरह। लेकिन मेरी सेना थी दुखियारे, और मेरा शासन था करुणा का शासन। मैं दुखियों के दुख को समझता, और उनकी आत्मा को सांत्वना देकर ठीक कर देता।
अब? अब तो यह सब एक सपना लगता है। एक धुँधली, दूर की याद। वह आदर, वह चमक, वह सामर्थ्य... सब कुछ ऐसे गायब हुआ जैसे रेत के महल को लहर बहा ले गई। अब मेरी गिनती नगर के कुत्तों से भी बदतर हो गई है। जिन पर मैंने दया की, वे अब मुझ पर थूकते हैं।
पर उन दिनों की स्मृतियाँ... वे मेरे जख्मों पर नमक छिड़कने का काम करती हैं। कभी-कभी सोचता हूँ, क्या वह सब सच था? क्या मैं वही अय्यूब हूँ? ईश्वर का दीया बुझ गया है, और उसकी मित्रता... कहाँ चली गई, पता नहीं। बस, यह अँधेरा रह गया है, और इन यादों की टिमटिमाती लौ, जो और भी ज़्यादा दर्द देती है।
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