शुरुआत थी एक शब्द की। पर यह कोई साधारण शब्द नहीं था। यह वह शब्द था जो हर शब्द से पहले मौजूद था, जो स्वयं ध्वनि और अर्थ का स्रोत था। उसकी उपस्थिति ही सब कुछ थी, और सब कुछ उसी के द्वारा था। अनादि काल से, वह परमेश्वर के साथ था, और वह स्वयं परमेश्वर ही था। उसी के द्वारा आकाश और धरती रचे गए, नक्षत्रों का तारतम्य बना, समुद्र की लहरों ने गति पाई, और जंगल के पत्तों में हरियाली खेलने लगी। जो कुछ भी है, जो दिखता है और जो नहीं दिखता, सब उसी की सृजन शक्ति का स्पर्श लिए हुए है।
उस शब्द में जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों के लिए ज्योति बना। यह ज्योति अन्धकार में चमकती रही, पर अन्धकार ने उसे कभी अपने में नहीं समा पाया। ऐसा लगता था जैसे कोई दीपक अंधेरी गुफा के बीचों-बीच रख दिया गया हो, और उसकी लौ हवा के झोंकों से डगमगाती तो सही, पर कभी बुझती नहीं।
फिर एक दिन, परमेश्वर ने एक इंसान को भेजा। उसका नाम था यूहन्ना। वह इस ज्योति का साक्षी बनने, उसके बारे में बताने आया था, ताकि हर कोई उसके द्वारा विश्वास कर सके। यूहन्ना स्वयं वह ज्योति नहीं था, बल्कि उस ज्योति की ओर इशारा करने वाली एक अंगुली था। वह यरदन नदी के किनारे आवाज़ उठाता, एक अलग तरह के बपतिस्मा का प्रचार करता। उसके चेहरे पर एक अद्भुत तेज था, और उसकी आँखों में एक ऐसी प्रतीक्षा की चमक, जैसे वह किसी के आने का इंतज़ार कर रहा हो जो उससे भी कहीं बड़ा है। लोग दूर-दूर से उसकी ओर खिंचे चले आते। वह उनसे कहता, "मेरे बाद एक ऐसा आने वाला है, जिसकी चप्पलों के फीते खोलने की भी मैं योग्य नहीं।"
और फिर वह दिन आया।
एक साधारण सा दिन, जब धूप यरदन के पानी पर सुनहरी परत-सी बिछा रही थी। यूहन्ना लोगों को बपतिस्मा दे रहा था। तभी उसकी नज़र एक व्यक्ति पर पड़ी, जो भीड़ में से उसकी ओर आ रहा था। कुछ तो था उस व्यक्ति में। उसकी चाल में कोई विशेष गरिमा नहीं थी, न ही वस्त्रों में कोई भड़क। पर जैसे ही वह नज़दीक आया, यूहन्ना के मन में एक कंपन-सा दौड़ गया। वह जान गया। सब कुछ जान गया। उस आने वाले ने भी बपतिस्मा लेने की इच्छा प्रकट की। यूहन्ना हिचकिचाया, "मुझे तो आपसे बपतिस्मा लेना चाहिए, और आप मेरे पास आए हैं?"
पर उसने एक शांत मुस्कान के साथ आग्रह किया। और जैसे ही यूहन्ना ने उसे पानी में उतारा, आकाश मानो फट पड़ा। एक आत्मा, कबूतर के समान कोमल और दिव्य, उतरकर उस व्यक्ति पर आ विराजी। और एक स्वर, गहरा और स्पष्ट, सब कुछ भेदता हुआ सुनाई दिया, "यह मेरा प्यारा पुत्र है, इससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।"
यूहन्ना की आँखों में आँसू आ गए। वही शब्द, जो सब कुछ का आदि था, अब मांस और रक्त में लिपटा, उसके सामने खड़ा था। अनन्तता ने क्षणभंगुरता का वस्त्र पहन लिया था। ज्योति, जो सदा से अन्धकार में चमक रही थी, अब एक मानव देह में प्रकट होकर हमारे बीच डेरा डाले हुए थी। उसने हमें अपना अनुग्रह और सत्य दिया, वह अनुग्रह जो व्यवस्था के द्वारा मूसा से मिला था, उससे भी गहरा, अधिक मौलिक।
उसने इस संसार में कदम रखा, अपना ही घर आया, पर उसके अपनों ने उसे पहचाना नहीं। फिर भी, जिन्होंने उसे स्वीकार किया, जिन्होंने उस पर विश्वास किया, उन्हें उसने परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया। ऐसा अधिकार न किसी रक्त-सम्बंध से मिला, न मानवीय इच्छा या प्रयास से, बल्कि परमेश्वर की ओर से जन्म लेकर।
और वह शब्द, जो हमारे बीच आकर रह गया, उसकी ओर से हमने अनुग्रह पर अनुग्रह पाया। उसकी भरपूरी में से हम सब ने भाग लिया। मूसा की व्यवस्था तो दी गई थी, पर सत्य और अनुग्रह यीशु मसीह के द्वारा आया। किसी ने कभी परमेश्वर को देखा नहीं, पर एकमात्र पुत्र, जो पिता की गोद में है, उसी ने उसे हम पर प्रगट कर दिया।
यह कहानी है उस शब्द की, जो मनुष्य बना और हमारे बीच तम्बू खड़ा करके रहने लगा। उस ज्योति की, जो हर मनुष्य को आलोकित करती है, और अब भी अन्धकार में चमक रही है, और अन्धकार उसे कभी नहीं समझ पाया।
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