टूटे विश्वास और शाश्वत समुद्र

समुद्र के किनारे बसा वह छोटा-सा गाँव अस्ताचल के सूर्य की सुनहरी आभा में नहा रहा था। लहरों की...

टूटे विश्वास और शाश्वत समुद्र

समुद्र के किनारे बसा वह छोटा-सा गाँव अस्ताचल के सूर्य की सुनहरी आभा में नहा रहा था। लहरों की मधुर गुनगुनाहट और किनारे पर पड़ी पुरानी नावों की चरचराहट के बीच, अविनाश बूढ़ी आँखों से उस दूर के क्षितिज को ताक रहा था। उसकी पीठ सालों के अथक परिश्रम से झुक गई थी, पर आज उसके चेहरे पर एक अलग ही थकान थी – वह थकान जो शरीर से नहीं, मन के टूटने से आती है।

सुबह ही उसने सुना था – गाँव के मुखिया का बेटा, जिस पर उसने अपने बचे-खुचे सिक्कों का भरोसा करके छोटी सी मछली पकड़ने की दुकान खोलने के लिए उधार दिया था, रातों-रात शहर चला गया था। वादा, विश्वास, सब कुछ लहरों के साथ बह गया। अविनाश की आशाएँ, उसकी बुढ़ापे की लकड़ी, टूटकर बिखर गई थीं।

"इंसान," उसने धीरे से समुद्र की ओर मुंह करके कहा, जैसे वह शिकायत कर रहा हो, "कितना छलता है। अपनी सांस तो उसकी नथुनों में है, पर दया उसके दिल में कहाँ?"

वहीं, पास के एक टूटे-फूटे चबूतरे पर, एक साधारण सा कपड़ा बिछाकर बैठा यिर्मयाह नाम का एक यात्री गीत गुनगुना रहा था। वह बूढ़ा नहीं था, पर उसकी आँखों में एक अद्भुत गहराई और शांति थी। उसने अविनाश की टूटी हुई मुद्रा देखी। कोई शब्द नहीं बोला, बस धीरे से गाना शुरू किया, उसकी आवाज लहरों के साथ मिलकर एक करुण स्वर बन गई:

"अपने भरोसे को मनुष्य के पास न रखना... उसकी सहायता व्यर्थ है। उसकी सांस निकल जाए, तो वह मिट्टी में मिल जाता है, और उसी दिन उसकी सब योजनाएँ मिट जाती हैं।"

अविनाश ने सिर घुमाया। शब्द उसके घावों पर मरहम लगा रहे थे। वह धीरे-धीरे चबूतरे के पास आकर बैठ गया।

यिर्मयाह ने मुस्कुराते हुए देखा और गाना जारी रखा, पर अब उसके स्वर में एक नई ऊर्जा आ गई, जैसे कोई जयघोष हो: "किन्तु धन्य है वह, जिसका सहारा याकूब का परमेश्वर है, जिसकी आशा अपने परमेश्वर यहोवा पर है! वही आकाश, पृथ्वी, समुद्र और जो कुछ उनमें है, बनाता है। वह सदा सत्य पर स्थिर रहता है।"

अविनाश ने आँखें बंद कर लीं। उसके मन में उसकी पुरानी नाव का चित्र आया, जो कई तूफ़ान झेल चुकी थी, पर समुद्र पर चलती रही। समुद्र... वही समुद्र जो कभी कोप से गरजता था, कभी शांत होकर सूर्य की किरणों को अपने आँचल में सोने जैसा चमकाता था। क्या वह सब संयोग था? या कोई हाथ था जो इन सबको संभाल रहा था?

यिर्मयाह की आवाज और भी मृदुल हो गई, जैसे कोई दादी बच्चे को कहानी सुना रही हो: "वह अन्याय सहनेवालों के लिए न्याय करता है... भोखों को रोटी देता है। यहोवा कैदियों को मुक्त करता है। यहोवा अंधों को देखने की शक्ति देता है। यहोवा टेढ़े होनेवालों को सीधा करता है। यहोवा धर्मियों से प्रेम रखता है।"

तभी, गाँव से होकर एक शोकयात्रा गुजरी। राधा, जिसके पति का देहांत हुआ था, सफेद कपड़ों में, सूनी आँखों से, सहारे के बिना चली जा रही थी। अविनाश ने देखा। उसके मन में पुरानी याद ताजा हो गई – जब उसकी अपनी पत्नी चल बसी थी, और उसे लगा था जैसे दुनिया खत्म हो गई है।

यिर्मयाह ने उस ओर देखकर कहा, जैसे अविनाश के विचार पढ़ रहा हो: "यहोवा परदेशियों की रक्षा करता है... अनाथ और विधवा का सहारा बनता है।"

फिर उसकी आवाज में एक दृढ़ता आई, एक अटल विश्वास: "किन्तु दुष्टों के मार्ग को वह टेढ़ा कर देता है। यहोवा सदैव राज करता है... तेरा परमेश्वर, हे सिय्योन, सारी पीढ़ियों के लिए!"

कुछ क्षणों तक सन्नाटा रहा। सिर्फ लहरों का संगीत और दूर कहीं चिड़ियों का कलरव। अविनाश ने आँखें खोलीं। उसके चेहरे पर गहरी उदासी अब धीरे-धीरे पिघल रही थी, जैसे सुबह की पहली किरण कोहरे को चीर देती है।

"तो... सब कुछ व्यर्थ नहीं है?" उसने फुसफुसाते हुए पूछा।

यिर्मयाह ने मुस्कुराया। "व्यर्थ वह है जो रेत पर बनाया जाए। समुद्र तो हमेशा से है, और हमेशा रहेगा। उसका रचयिता भी। हमारी सांस, हमारा आश्रय, हमारा न्याय करने वाला – वही है। मनुष्य तो बस... एक सीपी है, जो लहर के साथ आई और चली गई। पर समुद्र ठहरा रहता है।"

सूरज अब क्षितिज में लगभग डूब चुका था, आकाश में लाल और बैंगनी रंगों का अद्भुत खेल था। अविनाश उठा। उसके कंधों का बोङा हल्का लग रहा था। उसने यिर्मयाह की ओर देखा, दोनों की आँखों में एक अनकहा समझौता हुआ।

वह अपनी झोपड़ी की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसने राधा को देखा, जो अब अपने घर के सामने बैठी कुछ सब्जियाँ साफ कर रही थी। उसने रुककर सोचा। फिर अपनी थैली से दो मोटी-सी मछलियाँ निकालकर चुपचाप उसके पास रख दीं, और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया।

झोपड़ी में दीया जलाते हुए, उसने खिड़की से बाहर अँधेरे समुद्र को देखा। लहरें अब भी आ-जा रही थीं, निरंतर, अटल। उसके होंठों पर एक शांत मुस्कान खेल गई। उसका भरोसा अब किसी मुखिया के बेटे पर नहीं था। न ही अपनी ताकत पर। वह तो उस शक्ति पर टिक गया था, जो लहरों को चलाती है, सूरज को उगाती है, और टूटे हुए मनों को, धीरे-धीरे, अपने हाथों से सँभालती है। रात का अँधेरा गहरा था, पर उसके भीतर एक दीया जल उठा था – छोटा, पर बुझनेवाला नहीं।

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