Bible Story
स्वर्गीय यरूशलेम परमेश्वर का नया सृष्टिक्रम
**स्वर्गीय यरूशलेम: एक नई शुरुआत** प्रकाशितवाक्य 21 के अनुसार, जब समय पूरा हुआ और परमेश्वर की...
**स्वर्गीय यरूशलेम: एक नई शुरुआत**
प्रकाशितवाक्य 21 के अनुसार, जब समय पूरा हुआ और परमेश्वर की योजना अपने शिखर पर पहुँची, तो स्वर्ग से एक अद्भुत दर्शन प्रकट हुआ। यूहन्ना ने देखा कि पुराना आकाश और पुरानी पृथ्वी लुप्त हो गए थे, क्योंकि समुद्र भी अब नहीं था। फिर उसने एक नए आकाश और नई पृथ्वी को उतरते देखा—एक ऐसा संसार जहाँ पाप, मृत्यु और दुःख का कोई स्थान नहीं था। यह सब परमेश्वर के वचन के अनुसार पूरा हुआ, जैसा कि उसने प्रतिज्ञा की थी।
तभी यूहन्ना ने एक विशाल और पवित्र नगर को स्वर्ग से उतरते हुए देखा—**स्वर्गीय यरूशलेम**। यह नगर एक दुल्हन की तरह सजी हुई थी, जो अपने पति के लिए तैयार खड़ी थी। नगर की ज्योति मणियों जैसी चमकदार थी, और उसकी चमक सूर्य के प्रकाश से भी अधिक तेज थी। यह नगर परमेश्वर की महिमा से भरपूर था, और उसकी आभा मानो हीरे जैसी निर्मल और पारदर्शी थी।
### **नगर की भव्य संरचना**
नगर की एक ऊँची और मजबूत दीवार थी, जिसमें बारह द्वार बने हुए थे। हर द्वार पर एक स्वर्गदूत खड़ा था, और उन द्वारों पर इस्राएल के बारह गोत्रों के नाम लिखे हुए थे। दीवार के बारह नींव के पत्थर थे, और उन पर मसीह के बारह प्रेरितों के नाम अंकित थे। यूहन्ना ने देखा कि नगर की दीवारें यशब से बनी थीं—एक अद्भुत नीलमणि जिसका रंग आकाश जैसा नीला था। पूरा नगर शुद्ध सोने का बना हुआ था, मानो काँच की तरह पारदर्शी।
नगर की सड़कें शुद्ध सोने की थीं, परंतु वे साधारण सोने जैसी नहीं थीं—वे इतनी पारदर्शी थीं कि मानो पानी में से देख रहे हों। नगर के मध्य में परमेश्वर और मेमने का सिंहासन स्थापित था, और उस सिंहासन से जीवन की नदी बह रही थी, जो पारदर्शी जल की तरह चमक रही थी। नदी के दोनों ओर जीवन के वृक्ष लगे हुए थे, जो बारह प्रकार के फल देते थे—हर महीने एक नया फल। इन वृक्षों के पत्ते जाति-जाति के लोगों के चंगाई के लिए थे।
### **परमेश्वर का वास**
तब यूहन्ना ने एक ऊँचे शब्द को सिंहासन से यह कहते सुना:
*"देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है। वह उनके साथ निवास करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्वर होगा। वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा, और इसके बाद न मृत्यु रहेगी, न शोक, न विलाप, न पीड़ा; पहली बातें जाती रहीं।"*
ये वचन सुनकर यूहन्ना का हृदय आनंद से भर गया। उसने समझ लिया कि अब कोई अंधकार नहीं रहा, क्योंकि परमेश्वर स्वयं उनका प्रकाश बन गया था। नगर को किसी सूर्य या चंद्रमा की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की महिमा उसे प्रकाशित करती थी, और मेमना (यीशु मसीह) उसका दीपक था।
### **पवित्र नगर का महत्व**
यह नगर केवल एक सुन्दर स्थान नहीं था—यह परमेश्वर और मनुष्य के मिलन का प्रतीक था। यहाँ कोई अशुद्धता नहीं थी, कोई झूठ नहीं था, केवल वे ही प्रवेश कर सकते थे जिनके नाम मेमने की जीवन की पुस्तक में लिखे गए थे। यहाँ कोई मंदिर नहीं था, क्योंकि स्वयं सर्वशक्तिमान परमेश्वर और मेमना ही उसका मंदिर थे।
अंत में, यूहन्ना ने देखा कि नगर के द्वार कभी बंद नहीं होंगे, क्योंकि वहाँ रात नहीं होगी। सभी जातियों के लोग उसकी ज्योति में चलेंगे, और पृथ्वी के राजा अपनी महिमा और सम्मान उसमें ले आएँगे। कोई भी अशुद्ध या घिनौना काम उसमें प्रवेश नहीं करेगा, केवल वे जिन्हें मेमने ने पवित्र किया है।
इस प्रकार, परमेश्वर की योजना पूर्ण हुई—एक नया सृष्टिक्रम, जहाँ धर्मी उसके साथ अनंतकाल तक राज करेंगे। और यही सुसमाचार का अंतिम विजयगान है: **" देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूँ!"**
(प्रकाशितवाक्य 21)