**भजन संहिता 102 की कहानी: एक दीन की प्रार्थना**
एक समय की बात है, जब यरूशलेम के एक कोने में एक व्यक्ति बैठा हुआ था, जिसका नाम एलीआव था। वह गहरे दुःख और विपत्ति में घिरा हुआ था। उसके जीवन में ऐसा लग रहा था मानो परमेश्वर ने उससे अपना मुख मोड़ लिया हो। उसके दिन धुएँ की तरह बीत रहे थे, और उसकी हड्डियाँ आग की लपटों में जलती हुई प्रतीत होती थीं। वह इतना दुर्बल हो चुका था कि उसका हृदय घास के समान मुरझा गया था, और वह भोजन करना भी भूल गया था।
एक दिन, जब वह अपनी पीड़ा से तड़प रहा था, तो उसने अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाईं और परमेश्वर से प्रार्थना करने लगा:
**"हे यहोवा, मेरी प्रार्थना सुन! मेरी पुकार तेरे पास पहुँचे! मेरे क्लेश के दिनों में तू अपना मुख मुझसे न छिपा। जब मैं पुकारूँ, तू शीघ्र मेरी सुन ले!"**
एलीआव का हृदय टूटा हुआ था, लेकिन उसकी आशा परमेश्वर में अडिग थी। वह जानता था कि यहोवा सदा विश्वासयोग्य है और वह दीन-दुःखियों की पुकार को नहीं टालता। उसने अपने दुःख को शब्दों में ढालते हुए कहा:
**"मेरे दिन धुएँ के समान बीत गए हैं, और मेरी हड्डियाँ चूल्हे की तरह जल गई हैं। मेरा हृदय घास के समान मुरझा गया है, यहाँ तक कि मैं अपनी रोटी खाना भी भूल गया हूँ। मेरा शरीर हड्डी-पसली मात्र रह गया है, और मेरी त्वचा काली पड़ गई है।"**
उसकी पीड़ा इतनी गहरी थी कि वह अपने आप को एक उजाड़ नगर के समान पाता था, जहाँ कोई नहीं रहता। वह चिल्लाता था:
**"मैं जंगल के उल्लुओं के समान हो गया हूँ, घरौंदे के पक्षी की तरह अकेला रह गया हूँ। मैं रात भर जागता रहता हूँ और रोता हूँ, मानो कोई चिड़िया छत पर अकेली बैठी हो।"**
लेकिन फिर भी, एलीआव का विश्वास डगमगाया नहीं। उसने याद किया कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और उसकी करुणा अनन्तकाल तक बनी रहती है। वह बोला:
**"परन्तु हे यहोवा, तू सदा सिंहासन पर विराजमान रहता है, और तेरा नाम पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्मरण किया जाएगा। तू उठेगा और सिय्योन पर दया करेगा, क्योंकि उस पर कृपा करने का समय आ गया है।"**
एलीआव ने सोचा कि जिस प्रकार एक सेवक अपने स्वामी की ओर देखता है, उसी प्रकार वह परमेश्वर की ओर देख रहा है। उसने विश्वास किया कि यहोवा उसकी पुकार सुनेगा और उसके आँसुओं को देखेगा। वह जानता था कि परमेश्वर का समय सही होता है, और वह अपने लोगों को कभी नहीं छोड़ता।
कुछ समय बाद, एलीआव ने देखा कि परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना सुन ली है। उसका दुःख धीरे-धीरे कम होने लगा, और उसके हृदय में नई आशा जाग उठी। उसने महसूस किया कि यहोवा ने उसकी पीड़ा को देखा और उस पर दया की। वह बोला:
**"परमेश्वर की महिमा सदा बनी रहेगी! भावी पीढ़ियाँ उसकी सेवा करेंगी, और स्वर्ग के सारे प्राणी उसकी स्तुति करेंगे। वह अपने दासों की संतानों को स्थिर करेगा और उनके वंश को सदा बनाए रखेगा!"**
एलीआव की कहानी हमें सिखाती है कि चाहे हमारी परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, परमेश्वर हमारी पुकार सुनता है। वह हमारे आँसुओं को गिनता है और हमारे दुःख का अंत करता है। उसकी करुणा अनन्त है, और उसका प्रेम कभी समाप्त नहीं होता।
**"हे यहोवा, तू सदैव अटल रहता है, और तेरे वर्षों का कभी अंत नहीं होगा। तेरे दासों की सन्तान सुरक्षित रहेगी, और उनका वंश तेरे सामने स्थिर किया जाएगा!"** (भजन संहिता 102:28)
इस प्रकार, एलीआव ने अपने जीवन के अंधकारमय समय में भी परमेश्वर पर भरोसा रखा और उसकी विजय हुई। उसकी कहानी आज भी हमें यही सिखाती है कि परमेश्वर की दया कभी समाप्त नहीं होती, और वह सच्चे मन से पुकारने वालों को अवश्य सुनता है।