**भजन संहिता 131: एक विस्तृत कथा**
एक समय की बात है, यरूशलेम के पास एक छोटे से गाँव में एक बूढ़ी विधवा रहती थी, जिसका नाम रूथ था। वह बचपन से ही प्रभु पर भरोसा रखती थी, लेकिन जीवन ने उसे कई कठिनाइयों से गुज़ारा था। उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी, और उसका एकमात्र बेटा भी दूर देश में काम करने चला गया था। अकेली और निस्सहाय, रूथ अक्सर प्रार्थना करती और भजन गाती, पर कभी-कभी उसका मन बेचैन हो उठता। वह सोचती, *"प्रभु, मैं इतनी छोटी हूँ, मेरी समस्याएँ इतनी बड़ी क्यों हैं? क्या तू मेरी सुनता है?"*
एक दिन, जब वह जैतून के पेड़ों की छाया में बैठी थी, उसने एक युवा माँ को अपने छोटे बच्चे को गोद में लेकर सुलाते देखा। बच्चा बेचैन था, रो रहा था, लेकिन माँ ने धीरे से उसे चुप कराया और अपनी गोद में सुला दिया। बच्चा शांत हो गया, उसकी सारी बेचैनी दूर हो गई। यह दृश्य देखकर रूथ के मन में एक विचार कौंधा। उसने भजन संहिता 131 को याद किया:
*"हे यहोवा, मेरा मन गर्व से नहीं भरा है, न मेरी आँखें घमंड से ऊँची हैं। मैं न तो बड़े-बड़े कामों में पड़ता हूँ, न ऐसे कार्यों में जो मेरे लिए बहुत अधिक कठिन हैं। वरन् मैंने अपने मन को शांत और चुप किया है; जैसे दूध छुड़ाया हुआ बालक अपनी माँ की गोद में है, वैसे ही मेरा मन मेरे भीतर है।"*
रूथ ने महसूस किया कि उसका विश्वास अभी भी पूरी तरह शुद्ध नहीं था। वह चाहती थी कि परमेश्वर उसकी हर समस्या का तुरंत समाधान कर दे, लेकिन भजन ने उसे सिखाया कि विश्वास की सच्ची परिपक्वता धैर्य और समर्पण में है। उसने अपने मन को शांत किया और प्रार्थना की, *"प्रभु, मैं तेरे हाथों में अपने आप को सौंपती हूँ, जैसे एक बच्चा अपनी माँ की गोद में सुरक्षित होता है।"*
कुछ दिनों बाद, उसके बेटे ने उसे एक पत्र भेजा कि वह घर लौट रहा है और उसके साथ अपनी पत्नी और बच्चे को भी ला रहा है। रूथ की आँखों में आँसू आ गए। उसे समझ आया कि परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना सुन ली थी, लेकिन अपने समय पर। उसने महसूस किया कि जब वह अपनी इच्छाओं और चिंताओं को छोड़कर परमेश्वर की गोद में बैठ गई, तभी उसे सच्ची शांति मिली।
उस रात, जब वह अपने घर के छोटे से दीपक के नीचे बैठी थी, उसने भजन 131 को फिर से गुनगुनाया। अब उसके हृदय में कोई बेचैनी नहीं थी, कोई शिकायत नहीं थी। वह जान गई थी कि परमेश्वर उसकी देखभाल कर रहा है, और उसे बस विश्वास के साथ धैर्य रखना है। जैसे एक छोटा बच्चा बिना किसी चिंता के अपनी माँ की गोद में सो जाता है, वैसे ही अब रूथ का मन भी परमेश्वर की शांति से भर गया था।
**सीख:** भजन 131 हमें सिखाता है कि हमारा विश्वास सरल और निष्कपट होना चाहिए। हमें घमंड या बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाओं में नहीं, बल्कि परमेश्वर की गोद में शांति से बैठना सीखना चाहिए। जब हम अपनी इच्छाओं को उसके हाथों में सौंप देते हैं, तो वह हमारी देखभाल करता है और हमें वह शांति देता है जो संसार नहीं दे सकता।
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