**यिर्मयाह 45: बारूक की कहानी और परमेश्वर का सांत्वना**
यहूदा के अंतिम दिनों में, जब यरूशलेम पर संकट के बादल मंडरा रहे थे, एक व्यक्ति बारूक नामक यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता का सहायक था। बारूक एक विद्वान और ईमानदार व्यक्ति था, जो परमेश्वर के वचनों को लिखने और उन्हें लोगों तक पहुँचाने का कार्य करता था। परन्तु उन दिनों में यहूदा का राजा यहोयाकीम और उसके अधिकारी परमेश्वर के प्रति अवज्ञा में डूबे हुए थे। यिर्मयाह के द्वारा दिए गए चेतावनी के वचनों को सुनकर भी वे नहीं मानते थे, बल्कि उलटे भविष्यद्वक्ता को सताने लगे।
एक दिन, बारूक मन ही मन बहुत व्याकुल हो उठा। वह यिर्मयाह के साथ रहकर परमेश्वर की सेवा तो कर रहा था, परन्तु उसे लगने लगा कि उसके परिश्रम का कोई फल नहीं मिल रहा। लोग उनकी बातों को अनसुना कर देते, और उन पर मुसीबतें बढ़ती जा रही थीं। बारूक के मन में शिकायत उठी—*"हे परमेश्वर, मैंने तेरे लिए इतना कष्ट सहा है, मैंने तेरे वचन को लिखा और प्रचार किया, परन्तु मेरे जीवन में केवल दुःख और पीड़ा ही बढ़ती जा रही है! मैं थक गया हूँ, मेरी आशाएँ टूट रही हैं!"*
तब परमेश्वर ने यिर्मयाह के द्वारा बारूक से कहा—
*"हे बारूक, यहोवा इस्राएल का परमेश्वर तुझसे यह कहता है—'तू यह क्यों कहता है कि मेरे लिए मैंने बड़ी विपत्ति उठाई है? मैं सारे देश में जो कुछ बनाया था, उसे नष्ट कर रहा हूँ। तू अपने लिए बड़ी-बड़ी बातें क्यों चाहता है? उन्हें मत चाह! देख, मैं सब प्राणियों पर विपत्ति ला रहा हूँ, परन्तु जहाँ कहीं तू जाएगा, वहाँ मैं तेरे प्राण को तुझे लूट का माल देकर बचा लूँगा।'"*
ये वचन सुनकर बारूक का हृदय शांत हुआ। परमेश्वर ने उसे समझाया कि उसका ध्यान अपनी महत्वाकांक्षाओं पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा पर होना चाहिए। जब सम्पूर्ण देश परमेश्वर के न्याय का सामना कर रहा था, तब बारूक को यह विश्वास दिलाया गया कि परमेश्वर उसकी रक्षा करेगा। उसका जीवन सुरक्षित रहेगा, भले ही चारों ओर विपत्ति ही विपत्ति हो।
इस घटना के बाद बारूक ने अपनी शिकायतें छोड़ दीं और परमेश्वर की इच्छा में संतुष्ट रहने लगा। वह जान गया कि परमेश्वर की दृष्टि में वफादारी ही सबसे बड़ी महिमा है, न कि सांसारिक सफलता। जब बाद में बाबुल की सेना ने यरूशलेम को नष्ट कर दिया और अनेक लोगों को बंदी बना लिया, तब भी बारूक सुरक्षित रहा, क्योंकि परमेश्वर ने उससे वायदा किया था।
**सीख:** बारूक की कहानी हमें सिखाती है कि परमेश्वर की सेवा में हमें धैर्य रखना चाहिए। कई बार हमारी अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, परन्तु परमेश्वर हमारी रक्षा करता है और हमें उसकी इच्छा में संतुष्ट रहना सीखना चाहिए। जब संसार डगमगाता है, तब भी परमेश्वर के वफादार सेवकों को उसकी शरण में सुरक्षा मिलती है।
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