**कहानी: अय्यूब की परीक्षा (अय्यूब 2)**
एक समय की बात है, धरती के पूर्वी हिस्से में अय्यूब नाम का एक धर्मपरायण व्यक्ति रहता था। वह न केवल धनी और प्रतिष्ठित था, बल्कि परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित भी था। उसके दस बच्चे थे, हज़ारों भेड़-बकरियाँ, ऊँट और सेवक थे। वह हमेशा परमेश्वर की आराधना करता और अपने बच्चों के लिए नियमित रूप से बलिदान चढ़ाता, कहीं ऐसा न हो कि उन्होंने मन ही मन परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया हो।
एक दिन, स्वर्गलोक में परमेश्वर के सामने दूतों का समूह उपस्थित हुआ। उनके बीच शैतान भी आया। परमेश्वर ने शैतान से पूछा, "तू कहाँ से आया है?" शैतान ने उत्तर दिया, "मैं पृथ्वी पर इधर-उधर घूमता रहा हूँ।" तब परमेश्वर ने पूछा, "क्या तूने मेरे सेवक अय्यूब पर ध्यान दिया है? उसके समान खरा और सीधा, मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला कोई नहीं है।"
शैतान ने कुटिल मुस्कान के साथ उत्तर दिया, "क्या अय्यूब बिना किसी स्वार्थ के तेरी सेवा करता है? तूने उसके चारों ओर एक सुरक्षित घेरा बना रखा है—उसके घर, उसकी संपत्ति, उसके सब कुछ की रक्षा करता है। उसके हाथों का काम तूने आशीषित किया है। किंतु यदि तू उसकी हड्डियों और मांस को छू ले, तो वह तेरे मुख पर ही तुझे धिक्कारेगा!"
परमेश्वर ने शैतान को अनुमति दी, "देख, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण मत लेना।"
शैतान परमेश्वर के सामने से चला गया और अय्यूब को दुःख देने के लिए तैयार हो गया। उसने अय्यूब के शरीर को पाँव से लेकर सिर तक बुरे फोड़ों से भर दिया। अय्यूब ने अपने दर्द से राहत पाने के लिए एक ठीकरे से अपने शरीर को खुजलाया और राख में बैठकर अपना दुःख सहने लगा।
तभी उसकी पत्नी ने उससे कहा, "क्या तू अब भी अपनी सच्चाई पर डटा रहेगा? परमेश्वर को धिक्कार और मर जा!"
किंतु अय्यूब ने उसे डाँटते हुए कहा, "तू मूर्खों जैसी बातें करती है! हम परमेश्वर से अच्छाई तो स्वीकार करते हैं, तो दुःख क्यों नहीं?" इस सब में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया।
इसी बीच, अय्यूब के तीन मित्र—एलीपज, बिलदद और सोफर—जब उसकी इस विपत्ति के बारे में सुनकर उससे मिलने आए। दूर से ही उन्होंने उसे पहचाना ही नहीं, क्योंकि उसका चेहरा और शरीर विकृत हो चुका था। वे ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे, अपने वस्त्र फाड़ डाले और आकाश की ओर धूल उड़ाते हुए अय्यूब के पास बैठ गए। सात दिन और सात रात तक वे चुपचाप उसके साथ बैठे रहे, क्योंकि उसका दुःख इतना भयंकर था कि कोई शब्द उसे व्यक्त नहीं कर सकता था।
अय्यूब की कहानी हमें सिखाती है कि विपत्ति के समय भी परमेश्वर पर भरोसा रखना चाहिए। उसकी योजनाएँ हमारी समझ से परे हैं, परन्तु वह हर परीक्षा में हमारे साथ खड़ा रहता है। अय्यूब ने अपनी आस्था नहीं छोड़ी, और अंत में परमेश्वर ने उसके धैर्य को आशीषित किया।
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