**रोमियों 7: एक आत्मिक संघर्ष की कहानी**
एक समय की बात है, यरूशलेम के पास एक छोटे से गाँव में यहूदा नाम का एक युवक रहता था। वह फरीसियों के समुदाय से था और परमेश्वर की व्यवस्था को बहुत गंभीरता से मानता था। बचपन से ही उसने मूसा की व्यवस्था को सीखा था—दस आज्ञाएँ, बलिदान की विधियाँ, शुद्ध और अशुद्ध के नियम—सब कुछ। यहूदा को लगता था कि यदि वह इन नियमों का पालन करेगा, तो परमेश्वर उससे प्रसन्न होगा और उसे धार्मिक ठहराएगा।
लेकिन एक दिन, जब यहूदा बड़ा हुआ और उसने अपने हृदय की गहराई में झाँका, तो उसे एक कड़वी सच्चाई का एहसास हुआ। वह चाहकर भी परमेश्वर की व्यवस्था का पूरी तरह पालन नहीं कर पा रहा था। उसके मन में लालच, ईर्ष्या और क्रोध के भाव उठते थे। वह बाहर से तो धर्मी दिखता था, लेकिन भीतर से वह अपने पापों से जूझ रहा था।
एक शाम, जब वह अपने कमरे में अकेला बैठा था, तो उसने परमेश्वर से प्रार्थना की, *"हे प्रभु, मैं तेरी व्यवस्था से प्यार करता हूँ, लेकिन मैं उसका पालन क्यों नहीं कर पाता? मैं अच्छा करना चाहता हूँ, पर बुराई मुझे घेर लेती है। मैं अपने आप को समझ नहीं पा रहा हूँ!"*
यहूदा की यह दशा उसी तरह थी, जैसे प्रेरित पौलुस ने रोमियों के नाम पत्र में लिखा था—*"मैं तो शरीर के अनुसार बेच दिया गया हूँ, और पाप के अधीन कर दिया गया हूँ। क्योंकि जो मैं करता हूँ, उसे मैं समझता नहीं; क्योंकि जो मैं चाहता हूँ, वह नहीं करता, पर जो बुराई से मैं घृणा करता हूँ, वही करता हूँ।"* (रोमियों 7:14-15)
यहूदा ने महसूस किया कि व्यवस्था पवित्र है, लेकिन वह उसे पाप से बचा नहीं सकती। व्यवस्था तो उसे पाप का एहसास दिलाती थी, पर उसे शक्ति नहीं देती थी। एक दिन, जब वह निराश होकर मंदिर के आँगन में बैठा था, तो उसने यीशु के बारे में सुना। लोग कह रहे थे कि यीशु ने क्रूस पर अपना लहू बहाया है ताकि पापियों को मुक्ति मिले। यहूदा ने सुना कि यीशु ने कहा था, *"जो कोई थका-माँदा है, वह मेरे पास आए, और मैं उसे विश्राम दूँगा।"* (मत्ती 11:28)
उसने अपने हृदय में एक नई आशा जगी। उसे समझ आया कि व्यवस्था के द्वारा कोई धर्मी नहीं ठहर सकता, परन्तु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह ही उद्धार का मार्ग है। उसने यीशु को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार किया और अनुभव किया कि अब वह पाप के बंधन से मुक्त हो चुका है।
पौलुस ने ठीक ही कहा था—*"अब जो मैं मसीह यीशु में हूँ, तो मैं अपने आप को दोषी नहीं ठहराता। क्योंकि व्यवस्था की आत्मा ने मुझे मसीह यीशु में जीवन के द्वारा पाप और मृत्यु के बंधन से स्वतंत्र कर दिया है।"* (रोमियों 8:1-2)
यहूदा ने अपने जीवन में एक नया अध्याय शुरू किया। अब वह व्यवस्था के भय से नहीं, बल्कि मसीह के प्रेम से प्रेरित होकर जीने लगा। उसने अनुभव किया कि पवित्र आत्मा उसे शक्ति देता है, ताकि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल सके।
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि मनुष्य अपने बल पर पाप से नहीं जीत सकता, परन्तु मसीह में हमें विजय मिलती है। जैसे पौलुस ने कहा—*"मैं मसीह के द्वारा उस परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ जो हमें विजय देता है!"* (रोमियों 7:25)
**समाप्त।**
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