यीशु मसीह का जंगल में प्रलोभन और सेवकाई का आरंभ
यह घटना उस समय की है जब यीशु मसीह ने यरदन नदी में यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से बपतिस्मा लिया था। उस समय आकाश खुल गया, और परमेश्वर की आत्मा कबूतर के समान उतरकर यीशु पर आई। तब स्वर्ग से एक आवाज़ सुनाई दी, "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूं।" यह सुनकर यीशु के हृदय में परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की ललक और भी प्रबल हो गई।
उसके बाद, यीशु आत्मा के द्वारा जंगल की ओर अगुवाई किए गए। यह कोई साधारण जंगल नहीं था, बल्कि एक निर्जन और वीरान स्थान था, जहां चारों ओर केवल पथरीली चट्टानें, झाड़ियाँ, और रेत के टीले दिखाई देते थे। सूरज की तेज धूप चट्टानों को तप्त कर देती थी, और रातें ठंडी और अंधेरी होती थीं। यीशु ने वहां चालीस दिन और चालीस रातें बिताईं। उस दौरान उन्होंने कुछ भी नहीं खाया। वे पूरी तरह से प्रार्थना और उपवास में लीन थे, परमेश्वर के साथ एकांत में समय बिता रहे थे।
चालीस दिन बीत जाने के बाद, यीशु को भूख लगी। उनका शरीर कमजोर हो गया था, लेकिन उनकी आत्मा मजबूत थी। तभी शैतान, जो हमेशा से परमेश्वर के विरुद्ध षड्यंत्र रचता आया है, यीशु के पास आया और उन्हें परखने लगा।
शैतान ने यीशु से कहा, "अगर तू परमेश्वर का पुत्र है, तो इन पत्थरों को आज्ञा दे कि ये रोटियां बन जाएं।"
यीशु ने शैतान की ओर ध्यान से देखा और उसकी चाल को समझ गए। उन्होंने उत्तर दिया, "यह लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी से ही नहीं जीता, बल्कि हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है।" यीशु ने शैतान को स्पष्ट कर दिया कि वे अपनी शारीरिक भूख को परमेश्वर के वचन से ऊपर नहीं रखेंगे।
तब शैतान ने यीशु को यरूशलेम के पवित्र नगर में ले जाकर मंदिर के शिखर पर खड़ा किया और कहा, "अगर तू परमेश्वर का पुत्र है, तो नीचे कूद जा, क्योंकि यह लिखा है कि परमेश्वर अपने स्वर्गदूतों को तेरी रक्षा के लिए भेजेगा, और वे तुझे हाथों पर उठा लेंगे, ताकि तेरे पैर किसी पत्थर से न टकराएं।"
यीशु ने शैतान की ओर दृढ़ता से देखा और कहा, "यह भी लिखा है कि तू अपने प्रभु परमेश्वर की परीक्षा न लेना।" यीशु ने शैतान को यह सिखाया कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं का दुरुपयोग करना और उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करना गलत है।
अंत में, शैतान ने यीशु को एक बहुत ऊंचे पहाड़ पर ले जाकर संसार के सारे राज्य और उनकी महिमा दिखाई और कहा, "यदि तू मेरे सामने गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूंगा।"
यीशु ने शैतान की ओर क्रोधित नजरों से देखा और कहा, "हे शैतान, दूर हो! क्योंकि यह लिखा है कि तू अपने प्रभु परमेश्वर को प्रणाम कर और केवल उसी की उपासना कर।" यीशु ने स्पष्ट कर दिया कि वे केवल परमेश्वर की आराधना करेंगे और किसी अन्य की नहीं।
शैतान यीशु के दृढ़ विश्वास और परमेश्वर के वचन के सामने हार गया। वह चला गया, और तब स्वर्गदूत आए और यीशु की सेवा करने लगे।
इस घटना के बाद, यीशु ने अपनी सेवकाई का आरंभ किया। वे गलील के प्रदेश में चले गए और वहां उन्होंने सुसमाचार का प्रचार करना शुरू किया। उनकी शिक्षाएं लोगों के हृदय को छूती थीं, और उनके चमत्कारों ने लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। यीशु ने कहा, "मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।"
यीशु ने अपने शिष्यों को बुलाना शुरू किया। वे गलील की झील के किनारे चल रहे थे, तभी उन्होंने शमौन और उसके भाई अन्द्रियास को मछली पकड़ते हुए देखा। यीशु ने उनसे कहा, "मेरे पीछे चले आओ, और मैं तुम्हें मनुष्यों के पकड़ने वाले बनाऊंगा।"
वे तुरंत अपने जाल छोड़कर यीशु के पीछे हो लिए। आगे चलकर यीशु ने याकूब और उसके भाई यूहन्ना को भी बुलाया, जो अपने पिता जब्दी के साथ नाव में जाल सुधार रहे थे। यीशु ने उन्हें भी अपने पीछे चलने के लिए बुलाया, और वे तुरंत नाव और अपने पिता को छोड़कर यीशु के साथ चल पड़े।
यीशु गलील के सारे प्रदेश में घूमते रहे, लोगों को सिखाते रहे, उनके रोगों को चंगा करते रहे, और उन्हें परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाते रहे। उनकी महिमा चारों ओर फैल गई, और लोग दूर-दूर से उनके पास आने लगे।
यीशु का जीवन और उनकी शिक्षाएं लोगों के लिए आशा और प्रकाश का स्रोत बन गईं। उन्होंने दिखाया कि परमेश्वर का वचन ही सच्चा मार्गदर्शक है, और उसके प्रति विश्वास और आज्ञाकारिता ही मनुष्य को शैतान के प्रलोभनों से बचा सकती है।
इस प्रकार, यीशु ने अपनी सेवकाई का आरंभ किया, और उनके पीछे चलने वालों के लिए वे जीवन के मार्ग, सत्य और ज्योति बन गए।
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